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________________ ८८ ताप तेने टालवाने मनशुद्धि ते परम सुन्दर ( जडीबुडी ) औषध छे ।। १३ ।। अनुभवामृतकुंडमनुत्तर व्रतमरालविलासपयोजिनी ॥ सकलकर्म कलंकविनाशिनी मनस एव हि शुद्धिरुदाहृता ॥ १४ ॥ अर्थ - वली मनशुद्धि अनुभवनो मोटो अमृतकुंड छे; तथा चारित्ररूप हंसने रमवाने कमलिनी छे, अने सर्व कर्मकलंक हरवाने अनि समान मन शुद्धिने कही छे ॥ १४ ॥ प्रथमतो व्यवहारनयस्थितोऽशुभविकल्प निवृत्तिपरो भवेत् ॥ शुभविकल्पमयव्रत सेवया हरति कंटक एव हि कंटकं ॥ १५ ॥ अर्थ – प्रथमथी व्यवहारनये रह्यो एहवो जे पुरुष ते अशुभ विकल्पनी निवृत्ति जे नाश कर तेने विषे तत्पर थईने शुभ विकल्पमय जे व्रत तेनी सेवा करे; तेथी अशुभपं टली जाय. जेम कांटा वडे कांटो नीकळी जाय छे तेनी परे ॥ १५ ॥ विषमधीत्य पदानि शनैः शनै हरति मंत्रपदावधि मांत्रिकः ॥ भवति देशनिवृत्तिरपि स्फुटा गुणकरी प्रथमं मनसस्तथा ॥ १६ ॥ अर्थ — जेम मंत्रवादी पुरुष मंत्रपद समाप्ति सुधी मंत्रना शब्द धीमे धीमे मनमां भणे, पण विषने टाले; तेम जे
SR No.023433
Book TitleAdhyatmasara
Original Sutra AuthorN/A
AuthorYashovijay, Veervijay
PublisherAdhyatmagyan Prasarak Mandal
Publication Year1938
Total Pages254
LanguageSanskrit
ClassificationBook_Devnagari
File Size15 MB
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