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________________ १२६ समरसिंह पूर्व अन्यान्य प्रान्तों में चारों वर्षों के लोग जैनधर्मका पालन करते थे परन्तु मरुभूमि में वाममार्गियों का इतना प्राबल्य हो गया कि एक ऐसी संस्था स्थापित करना अनिवार्य हो गया कि जिससे सब लोग जैनधर्म की उपासना समानरूप से करने के अधिकारी समझे जायें । वही संस्था आज पर्यंत चली आ रही है जो वर्तमान में ओसवाल के नाम से लोकप्रसिद्ध है। प्राचार्यश्री यक्षदेवसूरिने भारतवर्ष के पूर्वीयभाग में सवालक्ष जैनी नये बनाये तथा सिन्धप्रान्त में जैनधर्म का बजि वपन करने में अनेकानेक बाधाओं का निकितापूर्वक सामना किया । आचार्य श्रीकक्कसूरि जो सिन्धाधिपति महाराज रुद्राट् के सुपुत्र थे उन्होंने दीक्षित होने के पश्चात् अपनी जन्मभूमि के उद्धार में ही अपनी सारी शक्ति लगाई जिसके परिणामस्वरूप सिन्ध प्रान्त में जैन साम्राज्य स्थापित होगया । इतिहास इस बात का साक्षी है कि विक्रम की तेरहवीं शताब्दी तक सिन्धप्रान्त में अकेले उपकेशवंश के ५०० जिनालय विद्यमान थे । आचार्य श्री देवगुप्तसूरि ने कच्छ प्रान्त में असंख्य जैनी बनाये । आचार्य श्रीसिद्धसूरिने पञ्जाब और उसके निकटवर्ती प्रदेशों में परिश्रमपूर्वक लाखों अ. जैनों को जैनी बनाया । ___ इनके अतिरिक्त और भी उपकेशगच्छ के आचार्योने जहाँ जहाँ पदार्पण किया असंख्य अजैनों को जैनी बनाया । जिससे महाजन संघ की असीम अभिवृद्धि और जिनशासन की उत्कट सेवा हुई। विक्रम से चार शताब्दी पूर्व ही शुद्धि और संगठन का
SR No.023288
Book TitleSamar Sinh
Original Sutra AuthorN/A
AuthorGyansundar
PublisherJain Aetihasik Gyanbhandar
Publication Year1931
Total Pages294
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size25 MB
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