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________________ समरसिंह। वहाँपर मुग्धपुरसे मूर्तियों लेकर आया हुआ संघ भी आ मिला । उस संकटावस्था में भी धर्म की रक्षा करते हुए प्राचार्यश्री आघाटपुर ( मेवाड़ की राजधानी ) पधारे । आपने श्रमणसंघ की वृद्धि करते हुए जैनधर्म का खूब प्रचार किया । यह घटना विक्रम की दूसरी शताब्दी के लगभग की है। यह समय ठीक उसीसे मिलता है जब कि महात्मा जावड़शाह को म्लेच्छोंने अनेक प्रकार के कष्ट पहुँचाये थे । आचार्यश्री अपनी शिष्य मंडली सहित विहार करते हुए लाट प्रदेश में पधारे । श्री स्थम्भण श्री. संघके आग्रहसे सर्वधात की तथा अन्य भाँति की प्रतिमाओं की प्रतिष्टा भी आपश्री के करकमलोंसे सम्पादित हुई थी। इस प्रकार से आपने अनेक धर्मोन्नति तथा धर्म-रक्षा के कार्य किये । इसी गच्छमें पुनः कृष्णर्षि नामक एक बड़े प्रभाविक मुनि हुए थे । वे जाति के ब्राह्मण थे । इन्होंने नन्नप्रभ नामक मुनिके नावकैस्तत्र वास्तत्पैर्द दिरे निज नन्दनाः। दीक्षया मास भगवांस्तान कादशं संमिभान् ॥ १ श्री विक्रमादेक शते किचिदभ्यधिक गते । तेऽजायंत यक्षदेवाचार्य वर्य चरित्रिणः ॥ २ स्तंभ तीर्थेपुरे संघकारितः पितलामयः । श्रीपार्श्वः स्थापितो ये न मन्दिरे येर्मुनीश्वरै ॥ यरिवारे बहौ जाते शिष्यं कंचन धीनिधिं । ककसरि गुरु कृत्वा स्वपदे स्वर्ग जगामास ॥ (उ० चा० श्लोक १८८ से २०२)
SR No.023288
Book TitleSamar Sinh
Original Sutra AuthorN/A
AuthorGyansundar
PublisherJain Aetihasik Gyanbhandar
Publication Year1931
Total Pages294
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size25 MB
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