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६. वृत्तियों के निरोध का सृजन उपाय और अनुभूति रूप आनन्द
बाह्य और आंतरिक भावना आत्मा और परमात्मा का सम्बन्ध जोड़ने वाली जो भी प्रक्रिया है, उसे योग कहा जाता है। अपने आपको सम्पूर्ण रूप में जान लेना परमात्मा को जानना है। स्वानुभूति ही स्वतः का आनन्द है। दुःखों की निवृत्ति आनन्द का सृजन है और चित्त की एकाग्रता आनन्द का उपाय है।
योग के आठ अंगों के अनुष्ठान से चित्तगत अशुद्धि की विशुद्धि होने पर स्वानुभव में संलग्न साधक को सम्यःज्ञानादि का आविर्भाव होता है। वे आठों अंग-यम, नियम, आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार, धारणा, ध्यान और समाधि के नाम से प्रसिद्ध हैं।'
इनमें से प्रथम के पाँच अंग बहिरंग साधन कहे जाते हैं और अंत के तीन अंग अंतरंग साधन माने जाते हैं, क्योंकि प्रथम के पाँच अंग चित्तगत मलादि दोषों को दूर करने में अपना विशेष स्थान रखते हैं, जबकि अन्त के तीन सम्यग्ज्ञानादि के उदय में विशेष उपयोगी होते हैं। इन आठ अंगों का स्वरूप, सम्यग, अनुष्ठान और फलश्रुति जैन दर्शन में निम्न प्रकार से प्राप्त होते हैं । जैन दर्शन में वे आठों अंग - महाव्रत, योगसंग्रह, काया क्लेश, भाव प्राणायाम, प्रति संलीनता, धारणा, ध्यान और समाधि के नाम से प्रसिद्ध हैं।
१. महाव्रत (यम) जैनागमों में अहिंसा, सत्य, अस्तेय, ब्रह्मचर्य और अपरिग्रह-ये संज्ञा अणुव्रत और महाव्रत शब्दों में प्रसिद्ध हैं । वैसे ही योगदर्शन में यम और बौद्ध दर्शन में शील
१. पातञ्जल योगदर्शन में योग के आठ अंग का विस्तृत वर्णन है वही योग जैनागमों में अन्य नामों से
प्राचीन युग से प्राप्त है -- पातंजल योग
जैन योग१. यम
१. महाव्रत २. नियम
२. योग संग्रह ३. आसन
३. काय क्लेश ४. प्राणायाम
४. भाव प्राणायाम ५. प्रत्याहार
५. प्रतिसंलीनता ६.धारणा
६. धारणा ७. ध्यान
७. ध्यान ८. समाधि
८. समाधि