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জানুন
भगवतीसूत्र जैनअर्धमागधी आगम परम्परा का महत्त्वपूर्ण ग्रन्थ है। इसका मूल नाम व्याख्याप्रज्ञप्ति है। व्याख्याप्रज्ञप्ति नाम वाला यह पंचम अंग ग्रन्थ जनसाधारण में अपनी पूज्यता व महत्ता के कारण ही भगवती के नाम से प्रसिद्ध हुआ है। सम्पूर्ण ग्रन्थ प्रश्नोत्तर शैली में लिखा गया है जिसमें गौतम गणधर तथा अन्य जिज्ञासु शिष्यों द्वारा पूछे गये सहस्रों प्रश्नों के उत्तर श्रमण भगवान् महावीर ने स्वयं प्रदान कर उनकी जिज्ञासाओं को शांत करने का प्रयत्न किया है। वस्तुतः यह ज्ञान का ऐसा विश्व कोश है, जो अपने में समस्त विषयों को समाहित किये हुए है। आचार्यों ने इसे शास्त्रराज एवं ज्ञान का महासागर कहकर संबोधित किया है।
विभिन्न विषयों से संबंधित ज्ञान-विज्ञान की धारा को प्रवाहित करने वाला यह ग्रंथ शोध की दृष्टि से अत्यन्त महत्त्वपूर्ण है। ग्रन्थ की विशालता एवं विषयवस्तु की अक्रमबद्धता के कारण इस ग्रन्थ पर ऐसा कोई शोध कार्य नहीं हुआ जो इसके दार्शनिक पक्ष का प्रतिनिधित्व करता हो। अंग्रेजी में डॉ० जे. सी. सिकदर ने इस पर अपना विस्तृत शोध-प्रबंध प्रस्तुत किया है, किन्तु वह इसके सांस्कृतिक पक्ष का ही अधिक प्रतिनिधित्व करता है। डॉ० साध्वी चैतन्य प्रज्ञा जी ने इसके वैज्ञानिक पक्ष पर शोध अध्ययन प्रस्तुत किया है। प्रस्तुत कृति भगवतीसूत्र का दार्शनिक परिशीलन इस विशालकाय ग्रन्थ के दार्शनिक पक्ष को प्रस्तुत करने का एक छोटा सा प्रयास है। इस कृति की विषयवस्तु 17 अध्यायों में विभक्त है।
प्रस्तुत कृति के प्रथम अध्याय में इस अवसर्पिणी काल में हुए ऋषभदेव से लेकर भगवान् महावीर तक के 24 तीर्थंकरों का संक्षिप्त परिचय प्रस्तुत किया गया है। सभी तीर्थंकरों द्वारा मानव कल्याण के लिए उपदेश दिये जाते रहे हैं। किन्तु, जैन परम्परा अन्तिम तीर्थंकर भगवान् महावीर के उपदेशों को ही
प्राक्कथन
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