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________________ . प्राकृत जं चिअ 'विहिणा लिहिअं, 'तं चिअपरिणमइ सयललोअस्स । 'इअजाणिऊण धीरा, विहुरे वि 12न 'कायरा हुंति ।।238।। पत्ते 'वसंतमासे, 'रिद्धि पावंति सयलवणराई । ___ जं'न'करीरे पत्तं, ताकिं 12दोसो 10 वसंतस्स ? ।।239।। उइअंमि 'सहस्सकरे, सलोयणो 'पिच्छइ सयललोओ । जं न 'उलूओ पिच्छइ, 1"सहस्सकिरणस्स'को 12दोसो ? ।।240।। गयणमि गहा सयणमि, 'सुविणया सउणया वणग्गेसु । तह वाहरंति 'पुरिसं, 10जह 12दिटुं"पुव्वकम्मेहिं ।।241 ।। संस्कृत अनुवाद यच्चैव विधिना लिखितं, तच्चैव सकललोकस्य परिणमति । इति ज्ञात्वा धीराः, विधुरेऽपि कातरा न भवन्ति ।।238।। वसन्तमासे प्राप्ते सकलवनराजय ऋद्धिं प्राप्नुवन्ति । यत् करीरे पत्रं न, ततो वसन्तस्य को दोष : ? ||239।। सहस्रकरे उदिते, सलोचनः सकलजनः पश्यति । यदुलूको न पश्यति, सहस्रकिरणस्य को दोषः ? ||240।। गगने ग्रहाः, शयने स्वप्नाः, वनाग्रेषु शकुनाः । तथा पुरुषं व्याहरन्ति, यथा पूर्वकर्मभिर्दृष्टम् ।।241 ।। हिन्दी अनुवाद जोभाग्य में लिखा है, वही प्रत्येक जीव को होता है, यह जानकर धीरपुरुष संकट में भी कायर नहीं बनते हैं । (238) वसंतऋतु आने पर संपूर्ण वनसमूह खिलता है, परन्तु करीर (करील) के पेड़ पर पत्ते नहीं आते हैं, उसमें वसंतऋतु का क्या दोष ? (239) सूर्य का उदय होने पर चक्षुवान सभी लोग देख सकते हैं, परंतु उल्लू देख नहीं सकता है, उसमें सूर्य का क्या दोष ? (240) __ आकाश में सभी ग्रह, नींद में स्वप्न और वन में पक्षी भी पुरुष (मानव) को उस प्रकार अनुकूल या प्रतिकूल बनते हैं, जिस प्रकार पूर्वोपार्जित कर्मों द्वारा होनेवाला हो । (241) ॐॐ २२२ -
SR No.023126
Book TitleAao Prakrit Sikhe Part 02
Original Sutra AuthorN/A
AuthorVijaysomchandrasuri, Vijayratnasensuri
PublisherDivya Sandesh Prakashan
Publication Year2013
Total Pages258
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size36 MB
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