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________________ 23. सं. दुःषमसमयेऽपि खु, हेमसूरेर्वचनानि निश्रुत्य । कुमारपालेन सर्वजनो जीवदयां कारितः ।।43।। दुषमकाल में भी सचमुच श्रीहेमचन्द्रसूरीश्वरजी के वचन सुनकर कुमारपाल राजा द्वारा सभी लोगों के पास जीवदया करायी गयी। प्रा. रोवन्ति रुवावन्ति य, अलियं जपंति पत्तियावेन्ति । कवडेण य खंति विसं, मरन्ति न य जंति सब्भावं ||44|| सं. रुदन्ति रोदयन्ति च, अलीकं जल्पन्ति प्रत्याययन्ति । कपटेन च विषं खादन्ति, म्रियन्ते सद्भावं न च यान्ति ||44।। हि. (स्त्री) रोती है, रुलाती है, झुठ बोलती है, विश्वास दिलाती है, मायापूर्वक जहर खाती है, मरती है लेकिन सदभाव नहीं पाती है। 24. प्रा. मरणभयंमि उवगए, देवा वि सइंदया न तारेन्ति । धम्मो ताणं सरणं, गइत्ति चिंतेहि सरणत्तं ।।45।। सं. मरणभये उपगते, सेन्द्रा देवा अपि न तारयन्ति । धर्मस्त्राणं शरणं, गतिरिति शरणत्वं चिन्तय ||45।। मरण का भय प्राप्त होने पर इन्द्रसहित देव भी बचा नहीं सकते हैं, धर्म रक्षण, शरण, गति है इस प्रकार शरणत्व का विचार करे। 25. प्रा. हंतूण परप्पाणे, अप्पाणं जो करेइ सप्पाणं । अप्पाणं दिवसाणं, कए स णासेइ अप्पाणं ||46।। सं. परप्राणान् हत्वा य आत्मानं सप्राणं करोति ।। सोऽल्पानां दिवसानां कृते आत्मानं नाशयति ||46।। हि. जो अन्य के प्राणों का नाश करके स्वयं को प्राणवान् जीवित रखता है, वह थोड़े दिनों के (जीवन के लिए आत्मा का नाश करता है। हिन्दी वाक्यों का प्राकृत एवं संस्कृत अनुवाद 1. हि. पिता ने उपाध्याय के पास पुत्रों को तत्त्वों का ज्ञान ग्रहण करवाया । प्रा. पिअरो उवज्झायत्तो पुत्ते तत्ताणं नाणं घेप्पाविईअ । सं. पितोपाध्यायात् पुत्रांस्तत्त्वानां ज्ञानमग्राह्यत् । हि. सिद्धराज ने श्रीहेमचन्द्रसूरी. जी के पास व्याकरण की रचना करवायी इसलिए उसका नाम सिद्धहेम रखा गया । प्रा. सिद्धराओ हेमचंद्रसूरिणा वागरणं रचाविईअ, तत्तो सिद्धहेमं ति तस्स णामं ठविज्जईअ । - १११
SR No.023126
Book TitleAao Prakrit Sikhe Part 02
Original Sutra AuthorN/A
AuthorVijaysomchandrasuri, Vijayratnasensuri
PublisherDivya Sandesh Prakashan
Publication Year2013
Total Pages258
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size36 MB
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