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________________ ( १९६ ) मूल तथा अर्थ सहित. अंतरमुहूरत एकनीजी, उपशम स्थिति उवेख । उत्कर्षे षट आवलोजी, जवन्य समय होय शेषरे । जि०॥१०॥ अशुद्धपुंज जावा तणीजी, इच्छायें तिहां त.स । अणकसाय उदये हुएजी, जे उपशम न.शरे । जि० ॥ ११ ॥ - अर्थ--उपशमसमकीतनी स्थिति एक अंतर्मुहूर्तनी छे, ते मध्ये उत्कृष्टो छ आवली अने जघन्यथी एक आवळीनो काल बाकी रहे, त्यारे जोग्ने सम्यक्पमा अभावबुद्धि थाय, ते वखते अद्धपुजन जागनी इच्छा करतोयको अनंतानुबंधी गना कषानो उदय थवाथी उपशमसमकीतनो नाश करे ॥ १० ॥ ११ ॥ उपशमथी पडताथकांजी, न गयो मिध्य रे भाव ॥ तावत् सास्व.दन कयुंजी, उपशम स्वाद सहाव रे। जि०१२ अर्थ-एवी रीते उपशमसमकीतथी पडतीथको ज्यां मुधी मि. ध्यात्वा प्राप्त थयो नथी त्यांसुधी समकीतना स्वादवालं सास्वादनसमकीत कहेवाय. ॥ १२ ॥ अंतरमुहरत कालनीजी, उपशम स्थिति गुणखाण ॥ सास्वादन पर आवलीजी, वेदक समयप्रमाण रेजि०१३। स्थिति सागर तेत्रीसनीजी, साधिक क्षायक जाण ॥ बमणी स्थिति तेहथी कहीजी,क्षायोपशमिक ठाणरे जि.१४ अर्ध--गुणनी खाण एवा उपशमसमकीतनी स्थिति अं मुंहतनी छे, सास्वादननी छ आवलीनी, वेदकनी एक समयनी, क्षायिकसमझीवनी तेत्रीस सागरोपम झाशेरी, अने झायोपशमिकसमकीतनी छासठ सागरोपम झाझेरी स्थिति छे. ए उत्कृष्टुं काळ-मान कयु. ॥ १३ ॥ १४ ॥ कहेळ छे के-अंतमुहु तोबसमा । छावलि सासाण. वेयगो समओ॥ साहिय तित्तीसायर । खइओ दुगुणो खोवसमो।।
SR No.023119
Book TitlePushpa Prakaran Mala
Original Sutra AuthorN/A
AuthorPurvacharya
PublisherJinshasan Aradhana Trust
Publication Year
Total Pages306
LanguageSanskrit, Hindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size22 MB
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