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________________ धन्य-चरित्र/353 विश्वास पैदा हुआ है, वह स्वामी के द्वारा अवश्य पूर्ण होगा। वह भी आपके चातुर्य, आपकी विद्वत्ता को देखकर परम प्रसन्नता को प्राप्त होगी। अगर आपकी इच्छा हो, तो कल ही उसके घर पर चला जाये । वह स्थान आपके जाने योग्य है, आगे आपकी जैसे इच्छा।" __इस प्रकार की छल-भरी वार्ता को सुनकर प्रसन्न होते हुए कुमार ने कहा-“कल ही जायेंगे।" उन्होंने कहा-"बहुत अच्छा। बड़ी कृपा की। हम बिचारों का मनोरथ आपने पूर्ण किया।" इस प्रकार बातें करते हुए घर आ गये। रात्रि में भी कुमार के ही पास रहकर उसके रूप सौन्दर्य-चातुर्य-गीत गाने की कुशलता आदि का वर्णन करके कुमार के चित्त को उसके मिलन के लिए चंचल बना दिया। "कल अवश्य ही जायेंगे"-इस प्रकार निश्चय करके वे सो गये। प्रभात होने पर प्रातः कार्य से निवृत्त होकर कुमार ने स्वयं ही कहा-“रथ को तैयार करो।" । तब एक जुआरी ने घर के अन्दर सेठ से सारा वृत्तान्त निवेदन किया और कहा-"जरा देखिए तो सही, हम सेवकों का प्रयास । जिसने कभी भोगों का नाम तक नहीं लिया, वह थोड़े ही दिनों में आपके द्वारा इकट्टी की गयी सारी सम्पदा को सफल बनायेगा। उसे देखकर आपके मनोरथ पूर्ण होंगे। तब आप इन सेवकों के प्रयास की प्रशंसा करना।" वे पति-पत्नी यह सुनकर अत्यन्त हर्षित हुए। फिर उन जुआरियों में से कुछ ने आगे जाकर कामपताका को निवेदन किया कि "आज तुम्हारे घर नगर-सेठ के पुत्र को लेकर आयेंगे। अतः तुम उनके आगे अपनी कला के कौशल का अत्यधिक प्रदर्शन करके उनके मन को मोह लेना। कुमार ऐसी-वैसी कलाओं में ही कुशल नहीं है, बल्कि सभी शस्त्रों के हार्द को भी जाननेवाला है। अतः तुम सावधानीपूर्वक अपनी समस्त कलाओं का प्रदर्शन करना। अगर कुमार प्रसन्न होंगे, तो जंगम कल्पवृक्ष के समान इच्छित से भी ज्यादा प्रदान करेंगे।" उसने कहा-"आप तो उन्हें शीघ्र ही ले आइए। बाद में सब कुछ ज्ञात हो ही जायेगा। संयमी मार्ग में स्थित मुक्तिपुरी में प्रवेश करने के इच्छुक व्यक्तियों को भी हम पणांगनाओं ने सब कुछ छुड़वाकर कामभोग का रसिक बनाया है, तो उनके सामने इसकी क्या बिसात? यह तो मात्र वणिक पुत्र है। सब अच्छा ही होगा।" इतना कहकर उसने उन सभी को भेज दिया। फिर कुमार रथ पर आरूढ़ होकर उन सभी के साथ उसके आवास गृह पर गया। उसने भी कुमार के आगमन मात्र का श्रवण कर, उठकर स्वर्ण, रत्न व मोतियों से अंजलि भरकर मुख्य द्वार पर आकर कुमार को बधाकर कहा कि आप अपने चरणों से इस घर को पावन कीजिए। यह आपकी चरणोपासिका का घर है। आज आपने बड़ी कृपा की, मेरे आँगन में बिना बादलों के अमृत की वर्षा हुई। आज मेरे आँगन में कल्पवृक्ष फलित हुआ। बिना
SR No.022705
Book TitleDhanyakumar Charitra
Original Sutra AuthorN/A
AuthorJayanandvijay, Premlata Surana,
PublisherGuru Ramchandra Prakashan Samiti
Publication Year
Total Pages440
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size30 MB
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