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________________ धन्य-चरित्र/145 बड़ी नगरी देखकर वे लोग इधर-उधर विचरण करने लगे। घूमते-घूमते किसी सज्जन व्यक्ति को देखकर पूछा-“हे भद्र! इस नगर में धनी, अल्प धनी तथा निर्धन लोग कैसे रहते हैं अर्थात् कैसे आजीविका चलाते हैं?' तब उस नगरवासी ने कहा-“हे विदेशी! इस पुरी में जो धनवान है, वे अपनी नीति से व्यवसाय करते हैं, क्योंकि प्रकाशशील दीपक प्रकाश के लिए अन्य दीपक की अपेक्षा नहीं करता है। श्रीमन्तों को कौन-सा व्यापार नहीं होता? और भी, जो ये अनिन्द्य व्यवहारवाले हैं, वे धान्य का व्यवसाय करनेवाले, घी के व्यापारी, स्वर्णकार, मणिकार, ब्राह्मण, पट्ट-सूत्रिक, ताम्बूलिक, तेली, सुपारी के व्यवसायी, रेशमी वस्त्र के व्यवसायी, रुई-कपास के व्यवसायी, वस्त्र-व्यवसायी, माणिक्य आदि रत्नों के व्यवसायी, सुवर्ण के व्यवसायी, क्रयाणक के व्यापारी, पोत के व्यापारी, गान्धिक, सौगन्धिक आदि जो अति वैभववाले नहीं हैं, वे सभी वणिक महा-इभ्य श्रेष्ठी धन्य का धन ब्याज पर आश्रय लेकर निर्वाह करते हैं। जो जिस व्यवसाय में कुशल है, वह उस व्यवसाय को करके यथासुख से निर्वाह करता है। जैसे - नदी के तट पर नदी-प्रवाह के जल का आश्रय लेकर रेंट-प्रवृत्ति का निर्वाह करते हैं। जो अति निर्धन रूप से कठिनाई से जीते हैं, वे तो इसी श्रेष्ठी के महा सरोवर की खुदाई में अपने दारिद्र्य का खनन करते हैं। उस सरोवर को बनाने में यह नियम कर दिया गया है कि कर्मकारियों की स्त्रियों को प्रतिदिन एक दीनार तथा पुरुषों को दो दीनार श्रेष्ठी देता है। दोनों समय यथेच्छित तेल–अन्नादि भोजन देता है। इस समय यहाँ जो गरीब कर्मकार हैं, वे सरोवर की खुदाई द्वारा सुख से जीवन निर्वाह करते हैं। इस प्रकार नगरवासी की वार्ता को सुनकर धनसार प्रसन्न हो गया। फिर अपने परिवार सहित धनसार खनन अधिकारी के पास गया और विनय सहित नमन करके अपनी आजीविका के लिए बताया। तब बड़े अधिकारी ने कहा-हे वृद्ध! हमारे स्वामी के पुण्य बल से इतने कर्मकर सरोवर खोदने के उपाय से सुखपूर्वक जीते हैं। तुम भी कुटुम्ब सहित खनन का उद्यम करके और वृत्ति को ग्रहण करके सुख से काल का निर्वाह करो। तब धनसार उसके आदेश को प्राप्त करके कुटुम्ब सहित उस सर के खनन के लिए तैयार हो गया। प्रतिदिन कर्मकर-वृत्ति को प्राप्त करके समीप ही बनायी हुई कुटिया में रहते हुए सुखपूर्वक उदर पूर्ति करने लगे, क्योंकि स्वकृत कर्मोदय के वश से जीव कठिन-उदर-पूर्ति के लिए क्या-क्या नहीं करता? इसलिए साधकों को प्रतिक्षण कर्म-बन्ध की चिन्ता में सजग रहना चाहिए। इस प्रकार कितने ही काल के बीतने पर एक बार आधा दिन बीत जाने के बाद सम्पदा से पूर्ण, वेगवाले जनों से घिरा हुआ, मन्त्री-सामन्त आदि से युक्त, पैदल-हस्ती-अश्व सेना के समूह से युक्त, उत्साह सहित मागधों के समूह से
SR No.022705
Book TitleDhanyakumar Charitra
Original Sutra AuthorN/A
AuthorJayanandvijay, Premlata Surana,
PublisherGuru Ramchandra Prakashan Samiti
Publication Year
Total Pages440
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size30 MB
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