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________________ हैं । आप एक द्वीप वासिनी अधिष्ठात्री माता हो । माता ! यदि अज्ञानवश आप अपने कर्त्तव्य से गिरती हैं, तो मैं तो अपने कर्त्तव्य अथवा नीति से कदापि विचलित नहीं होऊँगा । मैंने अपने इस क्षण-भंगुर जीवन में निश्चय किया है। कि - " आमरण परस्त्री सहोदर रहूँगा मैंने अपने जीवन में यह महाव्रत लिया है कि इस जगत की सब स्त्रियाँ मेरी बहिनें हैं और सब वृद्धाएँ मेरी माताएँ हैं । " अपनी स्त्री के अतिरिक्त दूसरी स्त्रियों में ऐसी पवित्र बुद्धि रखना ही नर जीवन का ऊँचे-से-ऊँचा आदर्श है । परस्त्री के महापाप रूपी कीचड़ में फँसकर अपने जीवन को कलंकित करनेवाले पुरुष अधम से भी अधम हैं । माँ ! यह मेरा दृढ़ निश्चय है कि दिव्य, मानवी अथवा कैसी भी स्त्री मेरे सामने आवे, मैं अपने नियम से कदापि विचलित नहीं होऊँगा । माताजी ! सुनो - 1 —— " परनारि मेरी बहिन, पर नारी मम मात । भाई मैं परनारी का, साँची मानों बात ॥ प्रेम करे परनारि से, भलो न कहिये कोय | अपयश हो इस लोक में, पर-भव दुर्गति होय ॥ इतना कहकर उत्तम कुमार ने उसके चरणों को स्पर्श करते हुए कहा " माता ! मुझे पुत्र की भाँति समझकर आपकी विकार दृष्टि त्याग दीजिए । मैं आपकी शरण में हूँ। अपने पुत्र की रक्षा कीजिए । " राजकुमार के ऐसे विचार और वचनों को पेश्वरी ने सुनकर क्रुद्ध कहा - "राजकुमार ! मर्यादा में रह ! ऐसी अविचार पूर्ण बातें न कर ! तुझे मेरे कहने के अनुसार करना पड़ेगा । यदि तूं नम्रता से मेरी बातें न मानेगा तो मैं कह देती हूँ कि तुझे कष्ट भोगना पड़ेगा । तूं मुझे माता या बहिन कहकर नहीं बोल सकता । तूं मुझे प्रिया कहकर बुला मैं तेरी प्राण प्यारी स्त्री हूँ; ऐसा सोचकर | मेरी आज्ञा स्वीकार कर । अरे मन्द-बुद्धे ! तूं दूरदर्शिता से देख, तेरा अहोभाग्य है कि यह देवदारा तेरे वश में रहने को तैयार है । यदि मैं प्रसन्न हुं तो तुझे राज्य लक्ष्मी का अधिपति बना दूँगी; और यदि तूं अपने लाभ को खोकर मेरा वचन नहीं मानेगा ——— 21
SR No.022663
Book TitleUttamkumar Charitra
Original Sutra AuthorN/A
AuthorNarendrasinh Jain, Jayanandvijay
PublisherGuru Ramchandra Prakashan Samiti
Publication Year
Total Pages116
LanguageSanskrit, Hindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size9 MB
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