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________________ २६६ सन्धान-कवि धनञ्जय की काव्य-चेतना नवीन विधा का प्रवर्तक महाकाव्य भी है जिसे नानार्थक अथवा सन्धान-विधा के नाम से विशेष लोकप्रियता प्राप्त हुई है। आलोच्य सन्धान-कवि धनञ्जय का अस्तित्वकाल आठवीं शती ईस्वी के लगभग रहा था । डॉ. ए. एन. उपाध्ये तथा डॉ. वी.वी. मिराशी प्रभृति विद्वानों ने भी धनञ्जय के अस्तित्वकाल को आठवीं शती ईस्वी के लगभग ही स्वीकार किया है। जैन-धर्मावलम्बी धनञ्जय बहुविध काव्य-प्रतिभा के धनी थे। 'नाममाला' तथा 'अनेकार्थनाममाला' जैसी कोशशास्त्रीय एवं भाषावैज्ञानिक कृतियों के प्रणेता होने के अतिरिक्त 'विषापहार-स्तोत्र' उनका एक प्रसिद्ध भक्तिपरक स्तोत्र-काव्य जैन जगत् में अपनी साहित्यिक उत्कृष्टता की दृष्टि से महत्वपूर्ण स्थान रखता है । जैन पौराणिक वृत्त पर लिखा गया 'यशोधरचरित' एक चरित काव्य की विशेषताओं से अलंकृत है । इन सभी कृतियों में 'द्विसन्धान-महाकाव्य' एक सर्वोत्कृष्ट रचना है जिसमें कवि ने अपनी अद्भुत काव्य-प्रतिभा के साथ-साथ अपने विलक्षण पाण्डित्य एवं भाषा-आधिपत्य की असाधारण योग्यताओं का सफल प्रदर्शन किया धनञ्जयकालीन काव्य प्रवृत्तियों ने समसामयिक यग-चेतना से दिशा प्राप्त की थी। राजनैतिक दृष्टि से अराजक भारत में विद्वान् कवि राज्याश्रय के बिना प्रोत्साहन नहीं पा सकते थे फलत: कवियों का काव्य राज-दरबार की शोभा बन गया था। ऐसे में स्वाभाविक ही है कि धनञ्जय जैसे कवियों का आविर्भाव होता और युग-चेतना के अनुरूप ही काव्य को अलंकार-मण्डन जैसे कृत्रिम परिधानों से आवेष्टित कर लिया जाता। वीर एवं शृङ्गार इस युग की सर्वाधिक लोकप्रिय काव्य-प्रस्तुति मानी जाने लगी थी। इन्हीं युग-प्रवृत्तियों तथा काव्य-प्रवृत्तियों को साकार करता हुआ धनञ्जय का द्विसन्धान-महाकाव्य आठवीं शताब्दी का एक अलंकार-प्रधान प्रतिनिधि-काव्य है जिसमें कवि की असाधारण प्रतिभा की चकाचौंध देखते ही बनती है। इस सम्बन्ध में उल्लेखनीय है कि भारवि के किरातार्जुनीय महाकाव्य से कृत्रिम काव्य-सर्जना को पहले ही दिशा प्राप्त हो चुकी थी। धनञ्जय ने द्विसन्धान-महाकाव्य में उसे पल्लवित एवं विकसित करने की विशेष चेष्टा की है तथा सन्धान-विधा ने एक नये काव्य-सूत्र को जन्म भी दिया है। परम्परागत काव्य-लेखन का जहाँ तक सम्बन्ध है द्विसन्धान अपने पूर्ववर्ती महाकवि कालिदास, भारवि से प्रेरणा ग्रहण करते आये हैं। उनके अनेक पद्य
SR No.022619
Book TitleDhananjay Ki Kavya Chetna
Original Sutra AuthorN/A
AuthorBishanswarup Rustagi
PublisherEastern Book Linkers
Publication Year2001
Total Pages328
LanguageHindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size18 MB
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