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________________ ४२ दसवे । लियसुत्तं सो चेव ऊ तस्स अमूहभावो फलं व कीयस्स वहाय होइ ।। १ ।। जे यावि मंदित्ति गुरुं विइत्ता डहरे इमे अपए त्ति नच्चा । हीलति मिच्छं पडिवज्जमाणा करंति श्रसायण ते गुरूणं ॥ २ ॥ पगईए मन्दा वि भवति एगे डहरा वि य जे सुयबुद्धोववेया । श्रयारमंता गुणसुट्टियप्पा जे हीलिया सिहिरिव भास कुज्जा ॥ ३ ॥ जे यावि नाग डहरं ति नच्चा आलायर से अहियाय होइ । एवायरियं पि हु हीलयंतो अज्भयम ६-१ नियच्छइ जाइपहं खु मन्दे । ४ ।। श्रासीविसा यावि परं सुरुट्ठो किं जीवनासाउ परं नु कुज्जा । आयरियपाया पुरण अप्पसन्ना बोहि श्रसायण नत्थि मोक्खो ॥ ५ ॥ जो पावगं जलियमवक्कमेज्जा सविसंवाविहु कोवएज्जा । जो वा विसं खायइ जीवियट्ठी एसोवमाssसायण्या गुरूणं ॥ ६ ॥ सिया हु से पावय नो डहेज्जा सीविसो वा कुविओो न भक्खे | सिया विसं हालहलं न मारे न यावि मोक्खो गुरुहीलगाए ॥ ७ ॥
SR No.022614
Book TitleDashvaikalik Tatha Uttaradhyayan
Original Sutra AuthorN/A
AuthorHarshchandra Maharaj
PublisherAtmaram Mohanlal Sheth
Publication Year1949
Total Pages256
LanguageSanskrit
ClassificationBook_Devnagari, agam_dashvaikalik, & agam_uttaradhyayan
File Size13 MB
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