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________________ ग्रहण कर्या अने छेवटनी शिक्षारूप बे वचनो बोलतां कह्य के–“हे प्रिय पुत्र ! हवे तुं लेश पण प्रमाद करीश नहि. फरी वार बीजी माता न करवी पडे तेवी रीते चारित्र पालन करजे. जेम सिंहर्नु शिशु घणा घेटांओथी पण डरतुं नथी तेम तुं पुष्कळ परिसहोथी पराभव पामीश नहि." आ प्रमाणे उपदेश-वचन सांभळ्या बाद थावच्चापुढे हजार पुरुषो साथे पंचमुष्टी लोच करी दीक्षा ग्रहण करी. बाद परमात्मानी मुखथी पांच समिति तथा त्रण गुप्तिनुं स्वरूप जाणीने ते प्रमाणे आचरण करतां अने अन्य स्थविरो पासे शास्त्राध्ययन करतां समय व्यतीत करवा लाग्या. उपवास, छठ्ठ, अठ्ठमादिक तपश्चर्याओ द्वारा कर्मनी निर्जरा करवा लाग्या. आ प्रमाणे अध्ययन अने संयमधर्मनी एकनिष्ठ उपासना करतां अनुक्रमे तेओ चौदपूर्वना पारगामी बन्या. थावच्चापुत्रनी शक्ति हवे तो घणी ज वृद्धि पामी. श्रीनेमिनाथ भगवंतने पण तेमनी शक्ति माटे मान उत्पन्न थयु. एकदा थावच्चापुत्रे भगवंतथी जुदा विचरवानी वात करी अन्य देशमां धर्मप्रचार करवा जवा माटे आज्ञा मांगी. भगवंतनी आज्ञा मळतां तेओ उग्रविहार करतां करतां शेलगपुरे आवी पहोंच्या. ते स्थळे सुभूमिभाग नामना उद्यानमां वास को एटले ते नगरनो शेलक नामनो राजा पोताना विचक्षण पंथक आदि पांचसो प्रधानो साथे तेमने वंदन करवा आव्यो. नगरजनो पण वंदनार्थे आव्या अने मोटी पर्षदा थई. थावच्चा अणगारे उपदेश आपी लोकोने संसारनुं स्वरूप यथार्थ समजाव्यु, साथोसाथ जीवाजीवादि नव तत्त्वोनुं स्वरूप समजावी कर्मना अबाधित नियमनुं पण दिग्दर्शन कराव्यु. आवी सुंदर देशना सांभळी राजा तथा प्रजाजनो पण अत्यंत हर्षित थया. राजा शेलके का के–“उग्रकुलना, भोगकुलना, राजन्यकुलना तेम ज सेनापति अने सार्थवाह प्रमुख घणा दीक्षा अंगीकार करीने विचरे छे, परंतु मारी एवी शक्ति नथी माटे हे गुरुदेव ! मने समकितमूळ श्रावकना व्रत आपी श्रमणोपासक बनावो.” थावच्चा मुनिए तेने पूरती समजण आपी श्रावकधर्मना बार व्रतो उच्चराव्या अने तेनी साथोसाथ राजाना पंथक प्रमुख पांचसो मंत्रीओ पण श्रमणोपासक बनवा साथे नवतत्त्वना विषयना ज्ञाता बन्या. शेलकराजा स्वस्थाने गयो अने थावच्चा अणगार पण पृथ्वी पर विहार करवा लाग्या. ___आ बाजु सोगंधिया नामनी नगरीमां सुदर्शन नामनो महाश्रेष्ठी वसतो हतो. ते नगरीमा एकदा चार वेदोनो जाण, महामिथ्यात्वी अने तेना शास्त्रोनो पारगामी, सांख्य मतवादी शुक नामनो परिव्राजक पोताना हजार शिष्यो साथे आवी पहोंच्यो. ते पांच नियम युक्त शौचधर्मनी प्ररूपणा करतो हतो, तेमज कषायी वस्त्र धारण करतो हतो. परिव्राजकना आश्रममां तेने उतरेल जाणीने नगरीना लोको अने सुदर्शन शेठ पण तेमने वांदवा गया. ते समये उपदेश आपतां तेणे सुदर्शन शेठने उद्देशीने कां के—“हे श्रेष्ठी ! अमारो मूळ धर्म शौच छे. ते बे प्रकारे छे– (१) द्रव्यशौच अने(२) भावशौच. द्रव्यशौच एटले पाणी तथा माटीवडे अशुचि होय ते दूर करवी अने भावशौच एटले तृण अने मंत्रादिकथी कोई पण मलमूत्रादिकनी अशुचि थई होय ते दूर करवी. आ प्रमाणे १. ईर्यासमिति, भाषासमिति, एषणासमिति, आदानभंडमत्तनिक्षेपणासमिति अने पारिष्ठापनिकासमिति २. मनगुप्ति, वचनगुप्ति ने कायगुप्ति. श्रीगच्छाचार-पयन्ना- २८
SR No.022586
Book TitleGacchayar Ppayanna
Original Sutra AuthorN/A
AuthorVijayrajendrasuri, Gulabvijay
PublisherAmichand Taraji Dani
Publication Year1991
Total Pages336
LanguageSanskrit
ClassificationBook_Devnagari & agam_gacchachar
File Size31 MB
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