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________________ ९१ तवमग्गं [- ३०.६ तइयसमए निज्जिण्णं तं बद्धं पुटुं उदीरियं वेइयं निज्जिण्णं सेयाले य अकम्मं चावि भवइ ॥ ७१ ॥ ७२ अहाउयं पालइत्ता अन्तोमुहुत्तद्भावसेसाउए जोगनिरोहं करेमाणे सुहुमकिरियं अप्पडिवाई सुक्कज्झाणं झायमाणे तप्पढमयाए मणजोगं निरुम्भइ वइजोगं निरम्भइ कायजोगं निरुम्भइ आणापाणनिरोहं करेइ ईसि पंचरहस्सक्खरुच्चारणद्वाए य णं अणगारे समुच्छिन्नकिरिय अनियट्टि सुक्कज्झाणं झियायमाणे वेयणिज्जं, आउयं नामं गोत्तं च एए चत्तारि कम्मंसे जुगवं खवेइ ॥ ७२ ॥ ७३ तओ ओरालियतेयकम्माई सव्वाहिं विप्पजहणाहिं विप्पजहित्ता उज्जुसेढिपत्ते अफुसमाणगई उडुं एगसमएणं अविग्गहेणं तत्थ गन्ता सागारोवउत्ते सिज्झइ बुज्झइ जाव अन्तं करेइ ॥ ७३ ॥ ७४ एस खलु सम्मत्तपरक्कमस्स अज्झयणस्स अट्ठे समणेणं भगवया महावीरेणं आघविए पन्नविए परूविए दंसिए उवदंसिए ॥ ७४ ॥ ॥ त्ति बेमि ॥ ॥ सम्मत्तपरक्कमे समत्ते ॥ २९ ॥ ॥ तवमग्गं त्रिंशं अध्ययनम् ॥ जहा उ पावगं कम्मं रागदोससमज्जियं । खवेइ तवसा भिक्खू तमेगग्गमणो सुण ॥ १ ॥ पाणवहमुसावाया अदत्तमेहुणपरिग्गहा विरओ । राईभोयणविरओ जीवो भवइ अणासवो ॥ २ ॥ पंचसमिओ तिगुत्तो अकसाओ जिइन्दिओ । अगारवो य निस्सल्लो जीवो होइ अणासवो ॥ ३ ॥ एएसि तु विवञ्चासे रागद्दोस समज्जियं । खवेइ उ जहा भिक्खू तमेगग्गमणो सुण ॥ ४ ॥ जहा महातलायस्स सन्निरुद्धे जलागमे । उरिसचणाए तवणाए कमेणं सोसणा भवे ॥ ५ ॥ एवं तु संजयस्सावि पावकम्मनिरासवे । भवकोडीसंचियं कम्मं तवसा निज्जरिज्जइ ॥ ६ ॥
SR No.022572
Book TitleUttaradhyayan Sutram
Original Sutra AuthorN/A
AuthorR D Wadekar, N V Vaidya
PublisherFergussion College
Publication Year1954
Total Pages132
LanguageSanskrit
ClassificationBook_Devnagari & agam_uttaradhyayan
File Size10 MB
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