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________________ सम्मत्तपरक्कमे [- २९-१६ ६ निन्दणयाए णं भन्ते जीवे किं जणयइ ॥ निन्दणयाए णं पच्छाणुतावं जणय । पच्छाणुतावेणं विरज्जमाणे करणगुणसेढिं पडिवज्जइ । करणगुणसेटिं पडिवन्ने य णं अणगारे मोहणिज्जं कम्मं उग्धाएइ ॥ ६ ॥ ७ गरहणयाए णं भन्ते जीवे किं जणयइ ॥ गरहणयाए अपुरेक्कारं जणयइ । अपुरेक्कारगए णं जीवे अप्पसत्थेहिंतो जोगेहिंतो नियत्तेइ पसत्थे य पडिवज्जर पसत्थजोगपडिवन्ने य णं अणगारे अणन्त घाइपज्जवे खवे ॥ ७॥ ८ सामाइएणं भन्ते जीवे किं जणयइ ॥ सामाइएणं सावज्जजोगविरइं जणयह ॥ ८ ॥ ९ चउव्वीसत्थएणं भन्ते जीवे किं जणयइ ॥ च० दंसणविसोहिं जणयइ ॥ ९ ॥ १० वन्दणणं भन्ते जीवे किं जणयइ ॥ व० नीयागोयं कम्मं खवेइ | उच्चागोयं कम्मं निबन्धइ । सोहग्गं च णं अप्पडिहयं आणाफलं निव्वत्तेर दाहिणभावं च णं जणयइ ॥ १० ॥ ११ पडिक्कमणेणं मन्ते जीवे किं जणयइ । प० वयछिद्दाणि पिहेइ । 'पिहियवयछिद्दे पुण जीवे निरुद्धासवे असबलचरित्ते अट्टसु पवयणमायासु उवउते अपुहत्ते सुप्पणिहिंदिए विहरइ ॥ ११ ॥ १२ काउस्सग्गेणं भन्ते जीवे किं जणयइ ॥ का० तीयपड़प्पन्नं पायच्छित्तं विसोहेइ । विसुद्धपायच्छित्ते य जीवे निव्वुयहियए ओहरियभरु व्वं भारवहे पसत्थज्झाणोवगए सुहंसुहेणं विहरइ ॥ १२ ॥ १३ पच्चक्खाणं भन्ते जीवे किं जणयइ ॥ प० आसवदाराई निरुम्मइ । पच्चक्खाणेणं इच्छानिरोहं जणयइ । इच्छानिरोहं गए य णं जीवे सव्वदव्वंसु विणीयतण्हे सीइभूए विहरइ ॥ १३ ॥ १४ थवथुइमंगलेणं भन्ते जीवे किं जणयइ ॥ थ० नाणदंसणचरितबोहिलाभं जणयइ । नापदंसणचरित्तोहिलाभसंपन्ने य णं जीवे अन्तकिरियं कप्पविमाणोववत्तिगं आराहणं आराहेइ ॥ १४ ॥ १५ कालपडिलेहणयाए णं भन्ते जीवे किं जणयइ ॥ का० नाणावरणिज्जं कम्मं खवेइ ॥ १५ ॥ १६ पायच्छित्तकरणेणं भन्ते जीवे किं जणयइ ॥ पा० पावविसोहिं जय निरइयारे वावि भवइ । सम्मं च णं पायच्छित्तं पडिवज्जमाणे मृगं च मग्गफलं च विसोहेइ आयारं च आयारफलं च आराहेइ ॥ १६ ॥
SR No.022572
Book TitleUttaradhyayan Sutram
Original Sutra AuthorN/A
AuthorR D Wadekar, N V Vaidya
PublisherFergussion College
Publication Year1954
Total Pages132
LanguageSanskrit
ClassificationBook_Devnagari & agam_uttaradhyayan
File Size10 MB
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