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________________ $ Sutra 113] औपपातिकसूत्रम् . [ ७९ कुसले हयजोही गयजोही रहजोही बाहुजोही बाहुप्पमही वियालचारी साहसिए अलंभोगसमत्थे यावि भविस्सइ । . SUTRA 110. __ तए णं दढपइण्णं दारगं अम्मापियरो बावत्तरिकलापंडियं जाव अलंभोगसमत्थं वियाणित्ता विउलेहिं अण्णभोगेहिं पाणमोगेहिं लेणभोगेहिं वत्थभोगेहिं सयणभोगेहिं 5 कामभोगेहिं उवाणिमंतेहिति । । - SUTRA 111. तए ण से दढपइण्णे दारए तेहिं विउळेहिं अण्णभोगेहिं जाव सयणभोगेहिं णो सन्जिहिति णो राज्जिहिति णो गिज्झिहिति णो मुज्झिहिति णो अज्झोववन्जिहिति । SUTRA 112. से जहा णामए उप्पले इ वा पउमे इ वा कुसुमे इ 10 वा नलिणे इ वा सुभगे इ वा सुगंधे इ वा पोंडरीए इ वा महापोंडरीए इ वा सयपत्ते इ वा सहस्तपत्ते इ वा सयसहस्सपत्ते इ वा पंके जाए जले संवुड़े गोवलिप्पइ पंकरएणं णोवलिप्पइ जलरएणं, एवामेव दढपइण्णे वि दारए कामेहिं जाए भोगेहिं संवुड़े गोवलिप्पिाहीत 15 कामरएणं णोवलिप्पिहिति भोगरएणं गोवलिप्पिहिति मित्तगाइणियगसयणसंबंधिपरिजणेणं । SUTRA 113. से णं तहारूवाणं थेराणं अंतिए केवलं बोहिं बुज्झिहिति २ ता अगाराओ अणगारियं पइवाहीत।
SR No.022570
Book TitleOvavaiya Suttam
Original Sutra AuthorN/A
AuthorN G Suru
PublisherN G Suru
Publication Year1931
Total Pages104
LanguageSanskrit
ClassificationBook_Devnagari & agam_aupapatik
File Size6 MB
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