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________________ औपपातिकसूत्रम् [ ७३ $ Sutra 93 ] SUTRA 93. पहू णं भंते ! अम्पडे परिव्वायए देवाणुप्पियाणं अंतिए मुंडे भावेत्ता अगाराओ अणगारियं पव्वइत्तए ? SUTRA 94. णो इणट्ठे समट्ठे, गोयमा ! अम्मडे णं परिव्वायए समणोवासए अभिगयजीवाजीवे जाव अप्पाणं भावेमाणे विहरइ, णवरं ऊसियफलिहे अवंगुदुवारे चियत्तंते उरघरदार- 5 पवेसी [ क्वचित्- चियत्तघरंते उरपवेसो ] एयं णं वुच्चइ । SUTRA 95. पाणाइवाए अम्मडस्स णं परिव्वायगस्स धूल ए पच्चक्खाए जावज्जीवाए जाव परिग्गहे णवरं सब्वे मेहुणे पच्चक्खाए जावज्जीवाए । SUTRA 96. अम्मडल्स णं परिव्वायगस्स णो कप्पइ अक्खसोयप्पमाण- 10 तंपि जलं सयराहं उत्तरित्तए, णण्णत्थ अद्धाणगमणेण । अम्मडस्स णं णो कप्पइ सगडं वा एवं तं चैव भाणियन्त्रं जाव णण्णत्थ एगाए गंगा मट्टियाए । अम्मडस्स णं परिव्वायगस्त णो कप्पड़ आहाकम्मिए वा उदेसिए वा मी सजाए इ वा अज्झोयरए इ वा पूइकम्मे इ वा 15 कीयगडे इ वा पामिच्चे इ वा अणिसिहे इ वा अभिडे इ वा उत्तए वा रईत्तए वा कंतारभत्ते इवा दुब्भि १ B अहि. २ Noted in L ३ L उवियर, B ठवेइत्तए रइयए. औ. सू. १०
SR No.022570
Book TitleOvavaiya Suttam
Original Sutra AuthorN/A
AuthorN G Suru
PublisherN G Suru
Publication Year1931
Total Pages104
LanguageSanskrit
ClassificationBook_Devnagari & agam_aupapatik
File Size6 MB
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