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________________ ५५ - चतुर्थोऽध्यायः सानत कुमार में जघन्य स्थिति दो सागरोपम की जाननी. (४१) अधिके च । माहेन्द्र में दो सागरोपम अधिक जाननी. (४२) परतः परतः पूर्वा पूर्वानन्तरा । पहले पहले कल्प की जो उत्कृष्ट स्थिति वह अगले अगले कल्प की जघन्य स्थिति जाननी; सर्वार्थसिद्ध की जघन्य स्थिति नहीं हैं। (४३) नारकाणां च द्वितीयादिषु । __ नारकों की दूसरी वगेरा नरक में पहले पहले की जो उत्कृष्ट स्थिति वह आगे आगे की जघन्य स्थिति जाननी; सिलसिले वार १, ३, ७, १०, १७, २२, सागरोपम दूसरे से सातवीं तक जाननी. (४४) दश वर्षसहस्राणि प्रथमायाम् । पहली नरक भूमि में दश हजार वर्ष की जघन्य स्थिति है. (४५) भवनेषु च ।। .. भवनपति में भी जघन्य स्थिति दश हजार वर्ष की है. व्यन्तराणां च । व्यन्तर देवों की भी जघन्य स्थिति दस हजार वर्ष की (४७) परा पल्योपमम् । व्यन्तरों की उत्कृष्ट स्थिति पल्योपम की है. (४८) ज्योतिष्काणामधिकम् । ज्योतिष्क देवों की उत्कृष्ट स्थिति पत्योपम से कुछ अधिक है.. (४९) ग्रहाणामेकम् । ग्रहों की उत्कृष्ट स्थिति एक पल्योपम की हैं. ...
SR No.022521
Book TitleTattvarthadhigam Sutra
Original Sutra AuthorN/A
AuthorLabhsagar Gani
PublisherAgamoddharak Granthmala
Publication Year1971
Total Pages122
LanguageSanskrit
ClassificationBook_Devnagari
File Size7 MB
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