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________________ उपा. यशोविजयरचिते दृष्टि से विचार करते हैं तो प्रस्थकस्थल में भी कोई अनुपपत्ति नहीं होती है । कारण, विशेषविनिर्मोक और अशुद्धविषयविनिर्माक रूप संग्रह प्रस्थकस्थल में विवक्षित है। प्रस्थकस्थल में सामान्य का विधान न होने पर भी विशेष का विनिमंकि और अशुद्ध विषयविनिर्मोक तो रहता ही है, अतः उपरोक्त लक्षण की संगति होने पर प्रस्थकस्थल में भी कोई बाधा नहीं होती है। [ 'संग्रह में तत्परता' का क्या अर्थ ? ] (तत्प्रवणत्वञ्च) लक्षण वाक्य में 'संग्रहप्रवण अध्यवसायविशेष' ऐसा पद है । वहाँ प्रवण' शब्द से संग्रहजनक ऐसा अर्थ स्वभावत: प्रतीत होता है, क्योंकि कविताप्रवणः कविः, घटप्रवणः कुम्भकारः इत्यादि वाक्यों से कविता को बनानेवाला कवि, घट को बनानेवाला कुम्भकार, यही अर्थ स्वाभाविकरूप से बुद्धि में उतरता है। इसलिए 'संग्रहप्रवण' शब्द का अर्थ संग्रहनिष्ठजन्यतानिरूपितजनकतावान होना चाहिये । परन्तु यह अर्थ अनुपपन्न है क्योंकि संग्रह शब्द का अर्थ जो विशेषविनिर्माक और अशुद्धविषयविनिर्मोक रूप है उस का जनक नय नहीं होता, क्योंकि नय तो अध्यवसायरूप है, किन्तु विनिर्मोक शब्द का अर्थ जो निराकरण है वह तो नयवाक्य के प्रयोग से ही होता है । किसी भी वस्तु का निराकरण करने के लिए तद्विरोधीअर्थबोधक वाक्य का प्रयोग करना आवश्यक होता है। इसीलिए विनिर्माकात्मक अर्थरूप संग्रह का जनक अभिप्रायविशेषरूप नय नहीं हो सकता है। तब नयनिष्ठजनकता निरूपित जन्यता भी विनिर्मोकरूप संग्रह में कैसे उपपन्न होगी यह प्रश्न बना रहेगा । इस का समाधान करने के लिए "तत्प्रवण" शब्द का अर्थ उपाध्यायजी बताते हैं कि "तत्प्रवणत्वञ्च तन्निरूपितबुद्धिव्यपदेशजनकत्वं ।” इस का अभिप्राय यह है कि लक्षणवाक्य में संग्रहप्रवणशब्द का अर्थ 'सग्रहनिष्ठ जनकतानिरूपित जन्यतावत्' नहीं समझना चाहिए, किन्तु नैगमादिनयों से स्वीकृत जा विशेषरूप अर्थ और अशुद्ध विषय यानी औपचारिक अर्थ, उन का जो विनिर्मोक अर्थात् परित्याग, तव्यापक जो बुद्धि और व्यवहार, तन्निष्ठजन्यता निरू. । जनकत्व, यह तत्प्रवणत्वपद का अर्थ समझना चाहिए । अतः परित्यागरूप संग्रह में नयजन्यत्व न होने पर भी अव्याप्तिरूप दोष का प्रसंग नहीं आयेगा । इस का आशय यह है कि संग्रहनय महासामान्य जो सत्तारूप है, उसी का स्वीकार करता है, विशेष और अशुद्धविषय इस की दृष्टि से है ही नहीं । इसलिए सामान्य का ही विधान संग्रह से होता है, अतः सामान्यबुद्धि का जनक संग्रह बनता है। इसलिए "घटः सन्, पटः न" इत्यादि रूप महासामान्यबद्रिनिष्पजन्यता निरूपित जनकता सग्रहनय में रहती है. एवम् “घटः सन्, पटः सन्” इत्यादि महासामान्यविषयक व्यवहार भी संग्रह की दृष्टि से सभी वस्तुओं में होता है। इसलिए महासामान्य विषयक व्यपदेशनिष्ठ जन्यता निरू पित जनकता भी संग्रहनय में रहती है। ये महासामान्य विषयकबुद्धि और महासामान्यविषयक व्यवहार वहाँ होते हैं जहाँ विशेष और अशुद्धविषय का विनिर्मोक रहता है । अतः ईदृश विनिर्माकनिष्ठ व्याप्यतानिरूपित व्यापकता ‘सत्-सत्' इत्याकारक बुद्धि और व्यपदेश में आती है । एतादृश बुद्धि और व्यवहारजनकता अभिप्राय विशेषरूप सग्रहनय में
SR No.022472
Book TitleNay Rahasya
Original Sutra AuthorN/A
AuthorYashovijay Gani
PublisherAndheri Gujarati Jain Sangh
Publication Year1984
Total Pages254
LanguageSanskrit, Hindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size27 MB
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