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________________ जैन तर्क भाषा मुख्यत्वात्, सत्त्वाख्यस्य तु विशेषणत्वेनामुख्यत्वात् । प्रवृत्तिनिवृत्तिनिबन्धनार्थक्रियाकारित्वोपलक्षितो व्यञ्जनपर्यायः । भूतभविष्यत्त्वसंस्पर्शरहितं वर्तमानकालावच्छिन्नं वस्तुस्वरूपं चार्थपर्यायः । वस्तु पर्यायवद्रव्यमिति द्रव्ययोर्मुख्यामुख्यतया विवक्षणम्, पर्यायवद्रव्याख्यस्य धर्मिणो विशेष्यत्वेन प्राधान्यात्, वस्त्वाख्यस्य विशेषणत्वेन गौणत्वात् । क्षणमेकं सुखी विषयासक्तजीव इति पर्याय द्रव्ययोर्मुख्यामुख्यतया विवक्षणम्। अत्र विषयासक्तजीवाख्यस्य धर्मिणो विशेष्यत्वेन मुख्यत्वात्, सुखलक्षणस्य तु धर्मस्य तद्विशेषणत्वेनामुख्यत्वात् । न चैवं द्रव्यपर्यायोभयावगाहित्वेन नैगमस्य प्रामाण्यप्रसंगः, प्राधान्येन तदुभयावगाहिन एव ज्ञानस्य प्रमाणत्वात् । सामान्यमात्रग्राही परामर्शः संग्रहः-स द्वेधा, परोऽपरश्च । तत्राशेषविशेषेष्वौदासीन्यं भजमानः शुद्धद्रव्यं सन्मात्रमभिमन्यमानः परः संग्रहः । यथा विश्वमेकं सदविशेषादिति । द्रव्यत्वादीन्यवान्तरसामान्यानि मन्वानस्तभेदेष गजनिमीलिकामवलप्रदान की गई है और सत्त्वपर्यायको विशेषण बनाकर गौण कर दिया गया है। जिसमें प्रवृत्ति या निवृत्तिरूप अर्थक्रियाकी जा सकती हो, वह व्यंजन पर्याय है । (यह पर्याय व्यक्त होनेसे छद्मस्थोंके अनुभवमें आसकती है और त्रिकाल वर्ती होती है । ) किन्तु जो पर्याय भूत और भविष्यत् कालके स्पर्शसे रहित है-सिर्फ वर्तमानकाल में ही-एक समय मात्र ही रहता है, वह अर्थपर्याय कहलाता है । (आ) 'वस्तुपर्यायवाला द्रव्य है' यहाँ दो द्रव्योंमेंसे एकको मुख्य और दूसरेको अमुख्य विवक्षित किया गया है । 'पर्यायवान् द्रव्य' रूप धर्मीको विशेष्य बनाकर प्रधानता दी गई है और 'वस्तु' को विशेषण बनाकर गौण कर दिया गया है । (इ) 'विषयासक्त जीव एक क्षण सुखी होता है' यहाँ पर्याय और द्रव्यमेसे एकको प्रधान और एकको गौण कर दिया गया है । 'विषयासक्त जीव' धर्मी विशेष होनेके कारण प्रधान है और 'सुख' धर्म उसका विशेषण होनेसे अप्रधान हो गया है । _____नय एक ही अंशका ग्राहक होता है, किन्तु नैगमनय द्रव्य और पर्याय-दोनों अंशोंका ग्राहक है, अतएव उसे नय न मान कर प्रमाण मानना चाहिए; यह कहना ठीक नहीं। प्रमाण वही ज्ञान माना जाता है जो द्रव्य और पर्याय दोनोंको प्रधान रूपमें ग्रहण करता हो। नैगमनय एकको प्रधान और दूसरेको अप्रधान रूपमें ग्रहण करता है इस कारण प्रमाण नहीं कहा जा सकता। (२) सिर्फ सामान्यको ग्रहण करनेवाला अभिप्राय संग्रहनय कहलाता है। ग्राहय विषयके भेदसे संग्रहनय दो प्रकारका है-परसंग्रह और अपरसंग्रह । जो अभिप्राय समस्त विशेषोंमें उदासीनता धारण करता है और शुद्ध द्रव्य ‘सत्ता' परसामान्य को ही स्वीकार करता है, वह परसं हनय कहलाता है; जैसे-विश्व एक रूप है क्योंकि सत्से अतिरिक्त कहीं कुछ भी नहीं है । द्रव्यत्व आदि अपर सामान्योंको स्वीकार करनेवाला और उनके भेदों
SR No.022456
Book TitleJain Tark Bhasha
Original Sutra AuthorN/A
AuthorShobhachandra Bharilla
PublisherTiloakratna Sthanakvasi Jain Dharmik Pariksha Board
Publication Year1964
Total Pages110
LanguageSanskrit, Hindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size12 MB
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