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________________ अब सन्निकर्षके प्रमाणपनेका दृष्टान्तसे निषेध करते हैं: चक्षरसयोर्द्रव्ये संयुक्तसमवायवच्च ॥५॥ भाषार्थ-जिसप्रकार द्रव्यमें चक्षु और रसका संयुक्तसमवाय होता हुआ भी प्रमाण नहीं होता है-ज्ञानरूपी फलको पैदा नहीं करता है, उसीतरह द्रव्यमें चक्षु और रूपका संयुक्तसमवाय भी ज्ञानरूपी फलको पैदा नहीं कर सकता है। इसलिए सन्निकर्ष, प्रमाण नहीं है। प्रत्यक्षाभासका स्वरूप:अवैशये प्रत्यक्षं तदाभासं बौद्धस्याकस्माद्धमदर्शनादन्हिविज्ञानवत् ॥ ६ ॥ भाषार्थ-अविशदज्ञानको प्रत्यक्ष मानना प्रत्यक्षाभास है जैसेकि अकस्मात् धूम देखनेसे पैदा हुए बन्हिके ज्ञानको बौद्धलोग, प्रत्यक्ष मानते हैं । बस ; यह उनका प्रत्यक्ष नहीं है; किन्तु प्रत्यक्षाभास है । परीक्षाभासका स्वरूप:वैशद्येऽपि परोक्षं तदाभासं मीमांसकस्य करण ज्ञानवत् ॥७॥ भाषार्थ- विशदज्ञानको परोक्ष मानना परोक्षाभास है जैसे कि मीमांसक, करणज्ञानको परोक्ष मानते हैं बस, यह उनका परोक्ष नहीं है ; किन्तु परोक्षाभास है। .. ... भावार्थ-जिसके द्वारा अज्ञान हटता है उसको करणजान कहते हैं और अज्ञानके हटनेको फलज्ञान कहते हैं।..
SR No.022447
Book TitleParikshamukh
Original Sutra AuthorN/A
AuthorGhanshyamdas Jain
PublisherGhanshyamdas Jain
Publication Year
Total Pages104
LanguageSanskrit, Hindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size7 MB
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