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________________ प्रमाण-नय-तत्वालोक ] (६६) विरुद्ध उत्तरचरोपलब्धि विरुद्वोत्तरचरोपलब्धिर्यथा-नोद्गान्मुहूर्त्तात्पूर्वं मृगशिरः, पूर्व फल्गुन्युयात् ॥ ६१ ॥ अर्थ - एक मुहूर्त्त पहले मृगशिर नक्षत्र का उदय नहीं हुआ, क्योंकि अभी पूर्व फल्गुनी का उदय है । विवेचन – यहाँ प्रतिषेध्य मृगशिर का उदय है; उससे विरुद्ध मघा नक्षत्र का उदय है और मघा के उत्तरचर पूर्वफल्गुनी के उदय की उपलब्धि है । अत: यह विरुद्धउत्तरचरोपलब्धि का उदाहरण हुआ । · विरुद्ध सहचरोपलब्धि विरुद्ध सहचरोपलब्धिर्यथा - - नास्त्यस्य मिथ्याज्ञानं सम्यग्दर्शनात् ॥ ६२ ॥ अर्थ - इस पुरुष का ज्ञान मिथ्या नहीं है, क्योंकि समयदर्शन है । विवेचन – यहाँ प्रतिषेध्य मिथ्याज्ञान है, उससे विरुद्ध सम्यग्ज्ञान है और सम्यग्ज्ञान के सहचर सम्यग्दर्शन की उपलब्धि है । अतः यह विरुद्धसहचरोपलब्धि का उदाहरण है । विरुद्धोपलब्धि के इन सब उदाहरणों में हेतु से पहले 'निषेधसाधक' इतना पद और जोड़ देना चाहिए । जैसे- निषेधसावक विरुद्धस्वभावोपलब्धि, निषेधसाधक विरुद्ध कार्योपलब्धि, आदि ।
SR No.022434
Book TitlePramannay Tattvalok
Original Sutra AuthorN/A
AuthorShobhachandra Bharilla
PublisherAatmjagruti Karyalay
Publication Year1942
Total Pages178
LanguageSanskrit
ClassificationBook_Devnagari
File Size9 MB
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