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________________ प्रमाण-नय-तत्त्वालोक] (१३६) न्यार्थिक नय के भेद आयो नैगमसंग्रहव्यवहारभेदात् त्रेधा ॥ ६ ॥ अर्थ-द्रव्यार्थिक नय नीन प्रकार का है-(१) नैगम नय (२) संग्रह नय और (३) व्यवहार नय । नैगमनय धर्मयोर्धर्मिणोधर्मधर्मिणोश्च प्रधानोपसर्जनभावन यद्विवक्षणं स नैकगमो नैगमः ॥ ७ ॥ सच्चैतन्यमात्मनीति धर्मयोः ॥ ८॥ वस्तु पर्यायवद्रव्यमिति धर्मिणोः ॥ ४ ॥ क्षणमेकं सुखी विषयासक्तजीव इति धर्मधर्मिणो॥१०॥ अर्थ-दो धर्मों की, दो धमियों की और धर्म-धर्मी की प्रधान और गौण रूप से विवक्षा करना, इस प्रकार अनेक मार्गों से वस्तु का बोध कराने वाला नय नैगमनय कहलाता है। दो धर्मों का प्रधान-गौण भाव-जैसे अात्मा में सत्त्व से युक्त चैतन्य है। - दो धर्मियों का प्रधान-गौणभाव-जैसे पर्याय वाला द्रव्य वस्तु कहलाता है। धर्म-धर्मी का प्रधान-गौणभाव-जैसे विषयासक्त जीव क्षण भर सुखी होता है । विवेचन-दो धर्मों में से एक धर्म की मुख्य रूप से विवक्षा
SR No.022434
Book TitlePramannay Tattvalok
Original Sutra AuthorN/A
AuthorShobhachandra Bharilla
PublisherAatmjagruti Karyalay
Publication Year1942
Total Pages178
LanguageSanskrit
ClassificationBook_Devnagari
File Size9 MB
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