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________________ रायचन्द्रजैनशास्त्रमालायाम् असमर्थ भी है । फिर कैसा है ? [प्रदेशतः भेत्ता] अपने एक ही प्रदेशसे स्कंधोंका भेद करनेवाला है । जब अपने विघटनका समय पाता है उस समय स्कंधसे निकल जाता है इसकारण स्कंधका खंड करनेवाला कहा जाता है । फिर कैसा है ? [स्कन्धानां] स्कन्धोंका [कर्ता अपि] कर्ता भी है अर्थात् अपना कालपाय अपनी मिलनशक्तिसे स्कन्धोंमें जाकर मिल जाता है इसकारण इसको स्कन्धोंका कर्ता भी कहा गया है । फिर कैसा है ? [कालसंख्यायाः] कालकी संख्याका [प्रविभक्ता] भेद करनेवाला है । एक आकाशके प्रदेशमें रहनेवाले परमाणुको दूसरे प्रदेशमें गमन करते जो समयरूप कालपरिणाम प्रगट होता है उसको भेद करता है, इस कारण कालअंशका भी कर्ता है। फिर यह परमाणु द्रव्यक्षेत्र काल भावनकी संख्याके भेदको भी करता है सो दिखाया जाता है । यही परमाणु अपने एकप्रदेश परिमाणसे द्यणुकादि स्कन्धोंमें द्रव्यसंख्याका भेद करता है । और यही परमाणु अपने एकप्रदेशके परिमाणसे दो आदि प्रदेशोंसे लेकर अनंत प्रदेशपर्यंत क्षेत्रसंख्याका भेद करता है । फिर यही परमाणु अपने एकप्रदेशके द्वारा प्रदेशसे प्रदेशान्तरगतिपरिणामसे दो समयसे लेकर अनंतकालपर्यन्त कालसंख्याके भेदको करै है । फिर यही परमाणु अपने एकप्रदेशमें जो वर्णादिक भाव हैं जघन्य उत्कृष्ट भेदसे उस भेद संख्याको भी करता है । यह चार प्रकारका भेदभाव संख्या परमाणुजनित जान लेना। आगें परमाणु द्रव्यमें गुणपर्यायका स्वरूपकथन करते हैं। एयरसवण्णगंधं दो फासं सद्दकारणमसदं । खधंतरिदं व्वं परमाणुं तं वियाणेहि ॥ ८१॥ संस्कृतछाया. एकरसवर्णगन्धं द्विस्पर्श शब्दकारणमशब्दं । स्कन्धान्तरितं द्रव्यं परमाणुं तं विजानीहि ।। ८१ ॥ पदार्थ हे शिष्य ! [ यत् ] जो द्रव्य [एकरसवर्णगन्धं] एक है रस वर्ण गन्ध जिसमें ऐसा [द्विस्पर्श ] दो स्पर्श गुणवाला है [शब्दकारणं] शब्दकी उत्पत्तिका कारण है [अशब्दं] अपने एक प्रदेशकर शब्दत्वरहित है [स्कन्धान्तरितं] पुद्गलपिंडसे जुदा है [तं द्रव्यं] उस द्रव्यको [परमाणुं] परमाणु [विजानीहि] जान । भावार्थ-एक परमाणुमें पुद्गलके वीसगुणोंमेंसे जो पांच रस हैं उनमेंसे कोई एक रस पाया जाता है । पांच वर्णों से कोई एक वर्ण होता है । इसीप्रकार दो गंधोंमेसे कोई एक गन्ध तथा शीतस्निग्ध, शीतरूक्ष, उष्णस्निग्ध, उष्णरूक्ष, इन चार स्पर्शके युगलोंमेंसे एक कोई युगल होता है । इस प्रकार एक परमाणुमें पांच गुण जानने । यह परमाणु स्कन्धभावको परणया हुवा शब्दपर्यायका कारण है। और जब स्कन्धसे
SR No.022407
Book TitlePanchastikay Samaysar
Original Sutra AuthorKundkundacharya
AuthorPannalal Bakliwal
PublisherParamshrut Prabhavak Mandal
Publication Year1905
Total Pages184
LanguageSanskrit, Hindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size18 MB
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