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________________ रायचन्द्रजैनशास्त्रमालायाम् भावार्थ-परमाणु तो द्रव्य है उसमें स्पर्श रस गन्ध वर्ण ये चार गुण हैं । इन चारों ही गुणोंसे परमाणु मूर्तीक कहलाता है। परमाणु निर्विभाग है क्योंकि जो प्रदेश आदिमें है वही मध्य और अन्तमें है. इसकारण दूसरा भाग परमाणुका नहिं होता। द्रव्यगुणमें प्रदेशभेद नहिं होता. इसकारण जो प्रदेश परमाणुका है वही प्रदेश स्पर्श रस गन्ध वर्णका जान लेना । ये चार गुण परमाणुमें सदा काल पाये जाते हैं परन्तु गौण मुख्यके भेदसे न्यूनाधिक भी इन गुणोंका कथन किया जाता है । पृथिवी जल अग्नि वायु ये चारों ही पुद्गलजातियें परमाणुवोंसे उत्पन्न हैं । इनके परमाणुवोंकी जाति जुदी नहीं है. पर्यायके भेदसें भेद होता है । पृथिवी जाति परमाणुवोंमें चारों ही गुणोंकी मुख्यता है । जलमें गंध गुणकी गौणता है अन्य तीन गुणोंकी मुख्यता है । अनिमें गन्ध और रसकी गौणता है स्पर्श और वर्णकी मुख्यता है । वायुमें तीन गुणोंकी गौणता है स्पर्श गुणकी मुख्यता है । पर्यायोंके कारण परमाणुमें नानाप्रकारके परिणामगुण होते हैं । कहीं पर किसी एक गुणकी प्रगटता अप्रगटताके कारण नानाप्रकारकी परणतिको धारण करते हैं। प्रश्न-जिस प्रकार परमाणुवोंके परिणमनसे गंधादिक गुण हैं उसी प्रकार शब्द भी प्रगट होता होगा ? ऐसी जो कोई शंका करै तो उसका समाधान यह है कि परमाणु एकप्रदेशी है इस कारण शब्द प्रगट नहिं होता. शब्द है सो अनेक परमाणुवोंके स्कन्धोंसे उत्पन्न होता है इसकारण परमाणु अशब्दमय है । आगें शब्दको पुद्गलका पर्यायत्व दिखाते हैं । सदो खंधप्पभवो खंधो परमाणुसंगसंघादो॥ पुढेसु तेसु जायदि सद्दो उप्पादगो णियदो ॥ ७९ ॥ संस्कृतछाया. शब्दः स्कन्धप्रभवः स्कन्धः परमाणुसङ्गसङ्घातः । स्पृष्टेषु तेषु जायते शब्द उत्पादको नियतः ॥ ७९ ॥ पदार्थ-[शब्दः] शब्द जो हैं सो [स्कन्धप्रभवः] स्कन्धसे उत्पन्न है [परमाणुसङ्गसङ्घात] अनंत परमाणुवोंके मिलापका समूह [स्कन्धः] स्कन्ध होता है । [तेषु स्पृष्टेषु] उन स्कन्धोंके परस्पर स्पर्श होनेपर (नियतः] निश्चित [उत्पादकः] अन्य वर्गणावोंको शब्दायमान करनेहारा ऐसा [शब्दः] शब्द [जायते] उत्पन्न होता है । भावार्थ-द्रव्यकर्णेन्द्रियके आधारसे भावकर्णेन्द्रियकेद्वारा जो धुनि सुनी जाय उसे शब्द कहते हैं। वह शब्द अनंत परमाणुवोंका पिण्ड अर्थात् स्कन्धोंसे ही उत्पन्न होता है क्योंकि जब परस्पर महास्कन्धोंका संघट्ट होता है, तब शब्दकी उत्पत्ति होती है । और स्वभावहीसे उत्पन्न अनन्त परमाणुवोंका पिण्ड ऐसी शब्द योग्य वर्गणायें परस्पर मिलकर इस लोकमें सर्वत्र व्याप (फैल ) रही हैं । जहां जहां शब्दके उत्पन्न करनेको •
SR No.022407
Book TitlePanchastikay Samaysar
Original Sutra AuthorKundkundacharya
AuthorPannalal Bakliwal
PublisherParamshrut Prabhavak Mandal
Publication Year1905
Total Pages184
LanguageSanskrit, Hindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size18 MB
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