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________________ ३२ रायचन्द्रजैनशास्त्रमालायाम् व्यवहारप्राण हैं । प्राण उसको कहते हैं कि जिसके द्वारा जीवद्रव्यका अस्तित्व है । जीवभी संसार और सिद्धके भेदसे दो प्रकारके हैं। जो अशुद्ध प्राणोंके द्वारा जीता है सो तो संसारी है और जो शुद्ध प्राणोंसे जीता है वह सिद्ध जीव है । इसकारण सिद्धोंके कथंचित् . प्रकार प्राण हैं भी और नहीं भी हैं । जो निश्चय प्राण हैं वे तो पाये जाते हैं और जो व्यवहार प्राण हैं वे नहीं हैं । फिर उन ही सिद्धोंके क्षीरनीरकी समान देहसे संबंध भी नहीं है । किंचित् ऊन (कम ) चरम (अन्तके) शरीरप्रमाण प्रदेशोंकी अवगाहना है । ज्ञानादि अनन्तगुणसंयुक्त अपार महिमालिये आत्मलीन अविनाशी स्वरूपसहित तिष्टते हैं । आगें संसारी जीवके जैसे कार्यकारणभाव हैं, तैसे सिद्ध जीवके नहीं है, ऐसा कथन करते हैं। ण कुदोचि वि उपण्णो जमा कजं ण तेण सो सिद्धो। उप्पादेदि ण किंचि वि कारणमवि तेण ण स होदि ॥ ३६ ॥ संस्कृतछाया. न कुतश्चिदप्युत्पन्नो यस्मात् कार्य न तेन सः सिद्धः । उत्पादयति न किंचिदपि कारणमपि तेन न स भवति ॥ ३६ ॥ पदार्थ-[ यस्मात् ] जिस कारणसे [कुतश्चित् अपि] किसी और वस्तुसे भी [सिद्धः ] शुद्ध सिद्धजीव है सो [ उत्पन्नः न ] उपजा नहीं । [तेन ] तिस कारण [सः] वह सिद्ध [ कार्य] कार्यरूप नहीं है कार्य उसे कहते हैं जो किसी कारणसे उपजा हो सो सिद्ध किसीसे भी नहिं उपजे, इसलिये सिद्ध कार्य नहीं है । और जिस कारणसे [किंचित् अपि ] और कुछ भी वस्तु [ उत्पादयति ] उपजावता (न) नहीं है [तेन] तिस कारणसे [सः] वह सिद्ध जीव [ कारणं अपि ] कारणरूप भी [ न भवति ] नहीं है। कारण वही कहलाता है जो किसहीका उपजानेवाला हो, सो सिद्ध कुछ उपजावते नहीं. इसलिये सिद्ध कारण भी नहीं हैं। भावार्थ-जैसे संसारी जीव कार्य कारण भावरूप है तैसें सिद्ध नहीं है. सो ही दिखाया जाता है। संसारी जीवके अनादि पुद्गल संबंधके होनेसे भाव कर्मरूप परिणति और द्रव्यकर्मरूपं परिणति है । इनके कारण देव मनुष्य तिर्यच नारकी पर्यायरूप जीव उपजता है । इस कारण द्रव्यकर्मभावकर्मरूप अशुद्ध परिणति कारण है और चार गतिरूप जीवका होना सो कार्य है । सिद्ध जो हैं सो कार्यरूप नहीं है । क्योंकि द्रव्यकर्मभावकर्मका जब सर्वथा प्रकारसे नाश होता है, तब ही सिद्धपद होता है । और संसारी जीव जो है सो द्रव्य भावरूप अशुद्ध परिणतिको उपजावता हुवा चारंगतिरूप कार्यको उत्पन्न करता है. इस कारण संसारी जीव कारण भी कहा जाता है । सिद्ध कारण नहीं हैं क्योंकि सिद्धोंसे चार
SR No.022407
Book TitlePanchastikay Samaysar
Original Sutra AuthorKundkundacharya
AuthorPannalal Bakliwal
PublisherParamshrut Prabhavak Mandal
Publication Year1905
Total Pages184
LanguageSanskrit, Hindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size18 MB
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