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________________ ३० रायचन्द्र जैनशास्त्रमालायाम् आगें देहमात्र जीव किस दृष्टांत से है सो कहा जाता है । जह पउमरायरयणं खित्तं खीरं पभासयदि खीरं । तह देही देहत्थो सदेहमत्तं पभासयदि ॥ ३३ ॥ संस्कृतछाया. यथा पद्मरागरत्नं क्षिप्तं क्षीरे प्रभासयति क्षीरं । तथा देही देहस्थः स्वदेहमात्रं प्रभासयति ॥ ३३ ॥ पदार्थ – [ यथा ] जिस प्रकार [ पद्मरागरत्नं] पद्मरागनामा महामणि जो है सो [ क्षीरे क्षिप्तं ] दूध में डाला हुवा [ क्षीरं ] दूधको उस ही अपनी प्रभासे [ प्रभासयति ] प्रकाशमान करै है [ तथा ] तैसें ही [देही ] संसारी जीव [ देहस्थ : ] देहमें रहता हुवा [स्वदेहमात्रं ] आपको देहके बराबर ही [ प्रभासयति ] प्रकाश करता है । भावार्थ – पद्मराग नामा रत्न दुग्धसे भरे हुये वर्त्तन में डाला जाय तो उस रत्नमें ऐसा गुण है कि अपनी प्रभासे समस्त दुग्धको अपने रंग से रंगकर अपनी प्रभाको दुग्धकी बराबर ही प्रकाशमान करता है. उसी प्रकार यह संसारी जीव भी अनादि कषायोंके द्वारा मैला होता हुवा शरीरमें रहता है. उस शरीर में अपने प्रदेशोंसे व्याप्त होकर रहता है. इसलिये शरीरके परिमाण होकर तिष्ठता है और जिस प्रकार वही रत्नसहित दुग्ध अग्निके संयोगसे उबलकर बढता है तो उसके साथ ही रत्नकी प्रभा भी बढती है और जब अग्निका संयोग न्यून होता है, तब रत्नकी प्रभा घट जाती है. इसी प्रकार ही स्निग्ध पौष्टिक आहारादिके प्रभावसे शरीर ज्यों ज्यों बढता है त्यों त्यों शरीरस्थ जीवके प्रदेश भी बढते रहते हैं. और आहारादिककी न्यूनतासे जैसें २ शरीर क्षीण होता है तैसे २ जीवके प्रदेश भी संकुचित होते रहते हैं । और जो उस रत्नको बहुतसे दूध में डाला जाय तो उसकी प्रभा भी विस्तृत होकर समस्त दूधमें व्याप्त हो जायगी - तैसें ही बडे शरीरमें जीव जाता है तो जीव अपने प्रदेशोंको विस्तार करके उस ही प्रमाण हो जाता है - और वही रत्न जब थोड़े दूधमें डारा जाता है तो उसकी प्रभा भी संकुचित होकर दूधके प्रमाण ही प्रकाश करती है. इसीप्रकार बडे शरीरसे निकलकर छोटे शरीरमें जानेसे जीवके भी प्रदेश संकुचित होकर उस छोटे शरीरके बराबर रहेंगे- - इस कारण यह बात सिद्ध हुई कि यह आत्मा कर्मजनित संकोच विस्ताररूप शक्तिके प्रभाव से जब जैसा शरीर धरता है तब तैसा ही होकर प्रवर्तै है । उत्कृष्ट अवगाहना हजार योजनकी स्वयंभूरमण समुद्र में महामच्छकी होती है । और जघन्य अवगाहना अलब्ध पर्याप्त सूक्ष्म निगोदिया जीवोंकी है । आगें जीवका देहसे अन्य देहमें अस्तित्व कहते हैं और देहसे जुदा दिखाते हैं तथा अन्य देहके धारण करनेका कारण भी बलाते हैं । 1 सव्वत्थ अस्थि जीवो ण य एक्को एक्ककाय एकडो । अज्झवसाणविसिह चिट्ठदि मलिणो रजमलेहिं ॥ ३४ ॥
SR No.022407
Book TitlePanchastikay Samaysar
Original Sutra AuthorKundkundacharya
AuthorPannalal Bakliwal
PublisherParamshrut Prabhavak Mandal
Publication Year1905
Total Pages184
LanguageSanskrit, Hindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size18 MB
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