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________________ श्रीपञ्चास्तिकायसमयसारः । ११७ मोक्षका अभिलाषी जीव है सो [ पुनः ] फिर [ सिद्धेषु ] विभाव भावसे रहित परमात्मा भावोंमें [भक्तिं] परमार्थभूत अनुरागताको [ करोति ] करता है. क्या करकें स्वरूपमें गुप्त होता है [निःसङ्गः] परिग्रहसेरहित [च] और [ निर्ममः ] परद्रव्यमें ममता भावसे रहित [भूत्वा ] हो करकें [तेन ] उस कारणसे [ निर्वाणं] मोक्षको [ प्राप्नोति ] पाता है । भावार्थ - संसार में इस जीवके जब रागादिक भावोंकी प्रवृत्ति होती है तब अवश्य ही संकल्प विकल्पोंसे चित्तकी भ्रामकता हो जाती है. जहां चित्तकी भ्रामकता होती है तहां अवश्यमेव ज्ञानावरणादिक कर्मों का बन्ध होता है, इससे मोक्षाभिलाषी पुरुषको चाहिये कि कर्मबन्धका जो मूलकारण संकल्प विकल्परूप चित्तकी भ्रामकता है उसके मूलकारण रागा दिक भावोंकी प्रवृत्तिको सर्वथा दूर करै । जब इस आत्मा के सर्वथा रागादिककी प्रवृत्ति नष्ट हो जाती है तब यह ही आत्मा सांसारिक परिग्रहसे रहित हो निर्ममत्वभावको धारण करता है । तत्पश्चात् आत्मीक शुद्धस्वरूप स्वाभाविक निजस्वरूपमें लीन ऐसी परमात्मसिद्धपदमें भक्ति करता है तब उस जीवके स्वसमयकी सिद्धि कही जाती है. इस ही कारण जो सर्वथाप्रकार कर्मबन्धसे रहित होता है वही मोक्षपदको प्राप्त होता है. जबतक रागभावका अंशमात्र भी होगा तबतक वीतरागभाव प्रगट नहिं होता, इसकारण सर्वथा प्रकारसे रागभाव त्याज्य है । आगें अरहन्तादिक परमेष्ठिपदों में जो भक्तिरूप परसमय में प्रवृत्ति है उससे साक्षात् मोक्षका अभाव है तथापि परंपरायकर मोक्षका कारण है ऐसा कथन करते हैं । सपयत्थं तित्थयरं अभिगदबुद्धिस्स सुत्तरोइस्स । दूरतरं णिव्वाणं संजमतवसंपओत्तस्स ॥ १७० ॥ संस्कृतछाया. सपदार्थ तीर्थकरमभिगतबुद्धेः सूत्ररोचिनः । दूरतरं निर्वाणं संयमतपःसम्प्रयुक्तस्य ॥ १७० ॥ पदार्थ – [ सपदार्थ ] नवपदार्थसहित [ तीर्थकरं ] अरहन्तादिक पूज्य परमेष्ठीमें [ अभिगतबुद्धेः ] रुचिलिये श्रद्धारूप बुद्धि है जिसकी ऐसा जो पुरुष है उसको [निर्वाणं] सकल कर्मरहित मोक्षपद [दूरतरं ] अतिशय दूर होता है । कैसा है वह पुरुष जो नव पदार्थ पंचपरमेष्ठीमें भक्ति करता है ? [ सूत्ररोचिनः ] सर्वज्ञ वीतराग प्रणीत सिद्धान्तका श्रद्धानी है फिर कैसा है ? [ संयमतपः संप्रयुक्तस्य ] इन्द्रियदंडन और घोर उपसर्गरूप तपसे संयुक्त है । भावार्थ - जो पुरुष मोक्षके निमित्त उद्यमी हुवा प्रवर्त्ते है और मनसे अगोचर जिन्होंने संयम तपका भार लिया है अर्थात् अंगीकार किया है तथा परमवैराग्यरूपी भूमिका में चढनेकी है उत्कृष्ट शक्ति जिनमें ऐसा है, विषयानुराग भावसे रहित है तथापि प्रशस्त रागरूप परसमयकर संयुक्त है । उस प्रशस्त राग के संयोग से नवपदार्थ तथा पंचपरमेष्ठीमें भक्तिपूर्वक
SR No.022407
Book TitlePanchastikay Samaysar
Original Sutra AuthorKundkundacharya
AuthorPannalal Bakliwal
PublisherParamshrut Prabhavak Mandal
Publication Year1905
Total Pages184
LanguageSanskrit, Hindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size18 MB
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