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________________ १११ श्रीपञ्चास्तिकायसमयसारः। भावार्थ-सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान और सम्यक्चारित्र इन तीनोंकी एकता सो मोक्षमार्ग है। षद्रव्य पंचास्तिकाय सप्त तत्त्व नव पदार्थ इनका जो श्रद्धान करना सो सम्यक्त्व वा सम्यग्दर्शन है । द्वादशांगके अर्थका जानना सो सम्यग्ज्ञान है आचारादि ग्रन्थकथित यतिका आचरण सो सम्यक्चारित्र है । यह व्यवहारमोक्षमार्ग जीवपुद्गलके सम्बन्धका कारण पाकर जो पर्याय उत्पन्न हुवा है उसीके आधीन है। और साध्य भिन्न है साधन भिन्न है । साध्य निश्चय मोक्षमार्ग है साधन व्यवहार मोक्षमार्ग है । जैसें वर्णमय पाषाणमें दीप्यमान अग्नि जो है सो पाषाण और सोनेको भिन्न २ करती है तैसें ही जीवपुद्गलकी एकताके भेदका कारण व्यवहार मोक्षमार्ग है । जो जीव सम्यग्दर्शनादिकसे अन्तरंगमें सावधान है उस जीवके सब जगहँ उपरिके शुद्ध गुणस्थानोंमें शुद्धखरूपकी वृद्धिसे अतिशय मनोज्ञता है. उन गुणस्थानोंमें थिरताको धारण करै है ऐसा व्यवहार मोक्षमार्ग है । शुद्ध जीवको किसी एक भिन्न साध्यसाधनभावकी सिद्धि है क्योंकि अपने ही उपादान कारणसे स्वयमेव निश्चय मोक्षमार्गकी अपेक्षा शुद्ध भावोंसे परिणमता है वहां यह व्यवहार निमित्तकारणकी अपेक्षा साधन कहा गया है । जैसें सोना यद्यपि अपने शुद्ध पीतादि गुणोंसे प्रत्येक आंचमें शुद्ध चोखी अवस्थाको धरै है तथापि बहिरंग निमित्त कारण अग्नि आदिक वस्तुका प्रयत्न है तैसें ही व्यवहारमोक्षमार्ग है। आगे व्यवहारमोक्षमार्गसे साधिये ऐसा जो निश्चय मोक्षमार्ग, तिसका स्वरूप दिखाया जाता है। णिच्चयणयेण भणिदो तिहि तेहिं समाहिदो हु जो। अप्पा ण कुणदि किंचिवि अण्णं ण मुयदि सो मोक्खमग्गोत्ति॥१६॥ संस्कृतछाया. निश्चयनयेनभणितनिभिस्तैः समाहितः खलु यः । आत्मा न करोति किंचिदप्यन्यन् न मुञ्चति स मोक्षमार्ग इति ॥१६१ ॥ पदार्थ-[निश्चयनयेन] निश्चयनयसे [तैः त्रिभिः] उन तीन निश्चय सम्यग्दर्शन सम्यग्ज्ञान और सम्यक्चारित्रकर [समाहितः] परमरसीभावसंयुक्त [यः] आत्मा जो यह आत्मा [खलु] निश्चयकर [भणितः] कहा गया है सो यह आत्मा [अन्यत् ] अन्य परद्रव्यको [किश्चिदपि] कुछ भी न करोति] नहिं करता है [न मुश्चति] और न आत्मीक स्वभावको छोडता है [सः आत्मा] वह आत्मा [मोक्षमार्गः इति] मोक्षका मार्गरूप ही है इसप्रकार सर्वज्ञ वीतरागने कहा है। भावार्थ-सम्यग्दर्शन ज्ञान चारित्रसे आत्मीकस्वरूपमें सावधान होकर जब आत्मीक स्वभावमें ही निश्चित विचरण करता है तब इसके निश्चय मोक्षमार्ग कहा जाता है जो आपहीसे निश्चय मोक्षमार्ग होय तो व्यवहारसाधन किसलिये कहा ? ऐसी शंकापर
SR No.022407
Book TitlePanchastikay Samaysar
Original Sutra AuthorKundkundacharya
AuthorPannalal Bakliwal
PublisherParamshrut Prabhavak Mandal
Publication Year1905
Total Pages184
LanguageSanskrit, Hindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size18 MB
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