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________________ 8 रायचन्द्रजैनशास्त्रमालायाम्। गन्ध वर्ण इन चार विषयोंके ज्ञाता चार इन्द्रियसहित कर्ण और मनसे रहित चौइन्द्रिय जीव होते हैं। .. अब पंचेन्द्रिय जीवोंके भेद कहते हैं. सुरणरणारयतिरिया वण्णरसप्फासगंधसद्दण्ह । जलचरथलचरखचरा वलिया पंचेंदिया जीवा ॥ ११७ ॥ संस्कृतछाया. सुरनरनारकतिर्यञ्चो वर्णरसस्पर्शगन्धशब्दज्ञाः । जलचरस्थलचरखचरा बलिनः पञ्चेन्द्रिया जीवाः ॥ ११७॥ पदार्थ-[सुरनरनारकतिर्यञ्चः] देव मनुष्य नारकी और तिर्यश्च गतिके जीव हैं ते [पञ्चेन्द्रियाः] पञ्चेन्द्रिय [जीवाः] जीव हैं जो कि [जलचरस्थलचरखचराः] जलचर भूमिचर व आकाशगामी हैं और [वर्णरसस्पर्शगन्धशब्दज्ञाः] वर्ण रस गन्ध स्पर्श शब्द इन पांचों विषयोंके ज्ञाता हैं. तथा [बलिनः] अपनी क्षयोपशम शक्तिसे बलवान् हैं। भावार्थ-जब संसारी जीवोंके पंचेन्द्रियोंके आवर्णका क्षयोपशम होय तब पांचों विषयके जाननहारे होते हैं । पंचेन्द्रिय जीव दो प्रकारके हैं एक संज्ञी, एक असंज्ञी, जिन पंचेन्द्रिय जीवोंके मनआवरणका उदय होय वे तो मनरहित असंज्ञी हैं । और जिनके मनआवरणका क्षयोपशम होय वे मनसहित संज्ञी पंचेन्द्रिय जीव होते हैं. अर्थात तिर्यञ्च गतिमें मनसहित और मनरहित भी होते हैं । इसप्रकार इन्द्रियोंकी अपेक्षा जीवोंकी जातिका भेद कहा। अब इनही पांच जातिके जीवोंको चार गतिसंबंधसे संक्षेप कथन किया जाता है । देवा चउण्णिकाया मणुया पुण कम्मभोगभूमीया। तिरिया बहुप्पयारा णेरड्या पुढविभेयगदा ॥ ११८ ॥ संस्कृतछाया. देवाश्चतुर्निकायाः मनुजाः पुनः कर्मभोगभूमिजाः । तिर्यञ्चः बहुप्रकाराः नारकाः पृथिवीभेद्गताः ॥ ११८ ॥ पदार्थ-देवाः ] देव देवगतिनामा कर्मके उदयसे जो देवशरीर पाते हैं सबसे उत्कृष्ट भोग भोगते हैं ते देव हैं सो [चतुर्निकायाः] चार प्रकारके हैं। एक भवनवासी दूसरे व्यन्तर तीसरे ज्योतिषी चौथे वैमानिक होते हैं । [पुनः] फिर [मनुजाः] मनुष्य हैं ते [कर्मभोगभूमिजाः] एक कर्मभूमिमें उपजते हैं दूसरे भोगभूमिमें उपजनेवाले इसप्रकार दो तरहके मनुष्य होते हैं और [ तिर्यञ्चः बहुप्रकाराः ] तिर्यञ्चगतिके जीव एकेन्द्रियसे लगाकर सैनी पंचेन्द्रियपर्यन्त बहुत प्रकारके होते. हैं तथा [नारकाः पृथिवीभेदगताः] नारकी जीव हैं ते जितने नरक पृथिवीके भेद हैं उतने ही हैं. नरककी
SR No.022407
Book TitlePanchastikay Samaysar
Original Sutra AuthorKundkundacharya
AuthorPannalal Bakliwal
PublisherParamshrut Prabhavak Mandal
Publication Year1905
Total Pages184
LanguageSanskrit, Hindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size18 MB
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