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________________ ( २४ ) सोरठा । मनवचकाय सँभार, करै न इन्द्री विषयतें । करै न वसु अरि क्षार, धेरै कतरनी कंठ ते ॥७३॥ स्रग्विणी । किं तुमंधोसि किं वासि धत्तूरिओ । अहव किं सण्णिवाएण आऊरिओ ॥ अमयसमधम्म जं विस व अवमण्णसे । विसयविसविसम अमियं व बहु मण्णसे ॥ ७४ ॥ रोला । आतमजी कह अंध, भये कह कनक चबायौ । कै तुमने अब अमिट, रोग निरदोष उपायौ ॥ अमृत सम जिन बैन, ताहि किमि विष सरधानौ । विषम विषय विषरूप, ताहि अंमृत क्यों मानौ ॥७४॥ तुज्झ तुह णाणविण्णाणगुणडंबरो जलणजालासु निवडंतु जिअ निव्भरो ॥ पयइ वामेसु कामेसु जं रज्जसे जेहि पुण पुणविणिरयाणले पञ्चसे ॥७५॥ रेजिय तो विज्ञान, ज्ञान गुनको आडम्बर | अग्निज्वालमें सर्व, परै अरु बरै निरन्तर || जाकारण तू अजहुं, वक्र भोगनमें राचै। नरक अग्निमें पच्यौ, नच्यौ अरु फिरि फिरि नाचै ७५
SR No.022372
Book TitleIndriya Parajay Shatak
Original Sutra AuthorN/A
AuthorBuddhulal Shravak
PublisherNirnaysagar Press
Publication Year1912
Total Pages38
LanguageSanskrit
ClassificationBook_Devnagari
File Size3 MB
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