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________________ ( ३१ ) धीरज डोर सम्हारिक, इन्द्रियरूपी बाज । वश करि राखें ही जिया, सुधरै तेरो काज ॥१४॥ मणवयणकायजोगा सुणिअंतातेवि गुणकरा हुंति। अणिअंता पुणभंजति, मत्तकरीणुव्व सीलवणं ९५ मन वच काया वश कियें, करें तेहु कल्यान । नातर मत्तगयंदवत, नशै, शीलउद्यान ॥ ९५ ॥ जह जह दोसा विरमद जह जह विसएहिं होइ वेरग्गं । तह तह विण्णायव्वं आसण्णं से य परमपयं ॥ ९६ ॥ ज्यों ज्यों विषय विरागता, ज्यों ज्यों दोष विनाश । त्यों त्यों श्रावक सन्निकट, जानो पद अविनाश ॥१६॥ दुक्करमेएहिं कम, जेहिं समत्थेहिं जुव्वणत्थेहिं । भग्गं इंदियसिण्णं, धिइपायारं विलग्गेहिं ॥ ९७॥ तरुणवयसमें स्ववलतें, सजि धीरज प्राकार । इन्द्री दल जिन दलमल्यौ, कीन्हों सब कृति सार॥९७॥ तेधण्णा ताण णमो, दासोऽहं ताण संजमधराणं । अद्धच्छिपच्छिराओ, जाण ण हियए खडकंति ९८ ___ पद्धरी छंद । तिरछी चितौनितें लखनहारि। नहिं बास लहै जिन चितमँझारि ॥ १ घोड़ा । २ जवानीमें । ३ गढ़-परकोटा । ४ स्त्री।
SR No.022372
Book TitleIndriya Parajay Shatak
Original Sutra AuthorN/A
AuthorBuddhulal Shravak
PublisherNirnaysagar Press
Publication Year1912
Total Pages38
LanguageSanskrit
ClassificationBook_Devnagari
File Size3 MB
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