SearchBrowseAboutContactDonate
Page Preview
Page 26
Loading...
Download File
Download File
Page Text
________________ ( २१ ) विष विषयांकुश प्रेरित असीव । हो रहे अहो बहु विवश जीव ॥ निरलज्ज निशंक भये अनेक । यमराज कोप ना गिनत नेक ॥ ६३ ॥ विसयविसेणं जीवा, जिणधम्मं हारिऊण हा णरयं । वञ्चंति जहा चित्तय, णिवारिओ बंभदत्तणिवो॥६४॥ दोहा । 1 नरक परैं जिय विषयवश, हाय धरम विसराय । यातैं कियो विरक्त मुनि, ब्रह्मदत्त नरराय ॥ ६४ ॥ धिद्धी ताण णराणं, जे जिणवयणामयपि मुत्तूर्णं । चउगइविडंबणकरं, पियंति विसयासवं घोरं ॥ ६५ ॥ चौपाई | धिकधिकधिक ते नर हतभागी । जिनवचनामृतरसपरित्यागी ॥ चहुँगतिरूप विटम्बनकारी । विषय घोर मद पियत अनारी ॥ ६५ ॥ मरणेवि दीणवयणं, माणधरा जे गरा ण जंपंति । तेवि हु कुणंति लल्लिं, बालाणं णेहगहगहिला ६६ प्राण जाहिं पर गदगदवानी | नहिं बोलत जे नर अभिमानी ॥ बोलत दीन हीन ते वाचा । युवतिनेह जब गहै पिशाचा ॥ ६६ ॥
SR No.022372
Book TitleIndriya Parajay Shatak
Original Sutra AuthorN/A
AuthorBuddhulal Shravak
PublisherNirnaysagar Press
Publication Year1912
Total Pages38
LanguageSanskrit
ClassificationBook_Devnagari
File Size3 MB
Copyright © Jain Education International. All rights reserved. | Privacy Policy