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[४] मणतणु वयतणुति ओगिसगसत्त ॥ 'कर कारणु मदति जु, तिकालो सीयाल नंगसयं ॥४२॥ एयं च उत्तकाले, सयं च मण वय तणुहिं पालणियं ॥ जाणग जाणगपास, त्ति जंग चनगे तिसु अणुएणा ॥४३॥ फासिय पालिय सोहिय, तोरिय किट्टिय अ राहिय छ सुद्धं ।। पचरूखाणं फासिय, विहिणोचियकालि जे पत्तं ॥४४॥ पालिय पुणपुणसरियं, सोहिय गुरुदत्तसेसभोयणो ॥ तरिय समहियकाला, किट्टिय जोयणसमयसरणा ।। ४५॥अपडियरिशंआरा-हियं तु अहवा छ सुद्धि सद्दद्दणा ॥ जाणण विणयणुजासण, अणुपालणभाव सुद्धित्ति ॥४६॥ पञ्च. ख्खाणस्स फलं, इह परलोए य होइ सुविहं तु ॥ इहलोए धम्मिलाई, दामनगमा परलोए ॥४७॥ पञ्चरुवाणमिणं से-विऊण भावेण जिणवरुद्दिष्ठं ॥ पत्ता अणंत जीवा, सासयसुख्खं अणाबाहं ॥ ४ ॥