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________________ चक्रवर्तीने जीतवा योग्य ( विजया के०) विजयाः, एटले विजय ते (श्व के० ) अत्र, एटले था जंबूढीपने विषे बत्रीश तो महाविदेहना अने एक ऐरवत तथा एक जरत मली (चनतीसा के० ) चतुस्त्रिंशत् , एटले चोत्रीश (हुंति के० ) जवंति, एटले . हवे (पउमाश् महदह के०) पद्मादिका महा. द्रहाः, एटले बीजा द्रहोनी अपेक्षाए मोटा द्रढो, ते एक पद्म, बीजो महापद्म, त्रीजो तिगिति, चोथो केसरी, पांचमो घुमरिक अने बहो महापुमरिक, ए (के०) षट्, एटले बजे, तथा (कुरुसु के०) कुर्वोः, एटले दे. वकुरु अने उत्तरकुरुने विषे (दसमंति के०) दशकं इति, एटले दश अह ले. ए रीते सर्व मली (सोलसंगं के ) षोमशकं, एटो सोल मोटा पह जंबूछीपमा जाणवा ॥२०॥ हवे दशसु नदीओनो संख्या- द्वार कहे छे. गंगा सिंधू रत्ता, रत्तवई चन नई पत्तेयं॥ चनदसहिं सहस्सेहि, सम वंच्चति जलदिम्मि ॥२१॥
SR No.022340
Book TitleDandak Tatha Laghu Sangrahani
Original Sutra AuthorN/A
AuthorShravak Bhimsinh Manek
PublisherShravak Bhimsinh Manek
Publication Year
Total Pages174
LanguageSanskrit, Hindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size9 MB
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