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________________ भाई, पुष्पनगर (पटना) मां लई जईने तत्वोपदेश करीने समजावशे तो तारो मित्र तरतज मिथ्यात्वरुपी पापने छोडी देशे ॥ ९० ॥ हे सुबुद्धे ! जे प्रमाणे निरंतर असह्य दुःख देवावाला शरीरमा पेठेला कांटा वगेरेने सोय चिपिया वगेरेथी काढे छे, ते प्रमाणे पवनवेगना मनमां ठसेला मिथ्यारुपी कांटाने अनेक दष्टांतोथी उपदेश करीने काढजे ॥ ९१ ॥ त्यां पटनामां पूर्वापरादि अनेक दूषणोथी दूषित अन्यमतोने प्रत्यक्ष देखतो तारोमित्र अनेक दोषवाळा मिथ्यात्वरुपी अन्धकारने छोडीने तरतज ज्ञानरुपी प्रकाशमां आबी जशे ॥ ९२ ॥ ज्यां सुधी लोकमां जिनेंद्र भगवानना वचनोनो प्रकाश नथी त्यां सुधी मिथ्याद्रष्टिओना वचन प्रकाशरुप छे. जगत मात्रने प्रकाश मान करवामां कुशल एवा सूर्यनो प्रकाश थवा छतां शुं तारानां समूहनो प्रकाश थइ शके छ ? कदापि नहीं ॥ ९३ ॥ विपरीत द्रष्टिवाला अभव्यना सिवाय एवो कोण जीव छे के जेने जिनेंद्र भगवानना कहला निर्दोष वाक्योथी प्रतिबोध नहि थाय ? केमके घुवडना सिवाय सघळा जण महा अन्धकारनो नाश करवावाला सूर्यना किरणोना प्रभावथी पदार्थोने जुए छे ॥९४॥ आ प्रमाणे महा आनंददायक वचनो सांभळीने पापनो नाश करवावाला जिनेंद्र भगवानना चरणकमलोने सारी रीते नमस्कार करीने पोतानी विद्याना प्रभावथी रचेला सुंदर विमानमां बेसी ते मनोवेग विद्याधर जलदीथी पाताने घेर जवा लाग्यो ॥ ९५ ॥ आ प्रमाणे श्री अभितगति आचार्यकृत 'धर्मपरिक्षा' संस्कृत ग्रंथनी गुजराती भाषा टिकामां बीजुं प्रकरण पूर्ण थयुं ॥ २ ॥
SR No.022328
Book TitleDharmpariksha
Original Sutra AuthorN/A
AuthorIshwarlal Karsandas Kapadia
PublisherMulchand Karsandas Kapadia
Publication Year1910
Total Pages244
LanguageSanskrit, Hindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size14 MB
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