________________
३५६
मूलाचारनिःसंगो निरारंभो मिक्षाचर्यायां शुद्धभावश्च । एकाकी ध्यानरतः सर्वगुणाढ्यो भवेत् श्रमणः॥१०००॥
अर्थ-दोनोंतरहके परिग्रहके अभाव होनेसे साधु मूर्छारहित होता है, पापक्रियासे रहित होता है, भिक्षाचर्या में शुद्धभाव होता है, एकाकी ध्यानमें लीन होता है, और सबगुणोंसे परिपूर्ण होता है ॥ १००० ॥ णामेण जहा समणो ठावणिए तहय दव्वभावेण । णिक्खेवो वीह तहा चदुव्विहो होइ णायव्वो॥
नाम्ना यथा श्रवणः स्थापनया तथा च द्रव्यभावेन । निक्षेपोपि इह तथा चतुर्विधो भवति ज्ञातव्यः ॥१००१॥
अर्थ-नामकरके श्रमण, स्थापनासे श्रमण, द्रव्यसे श्रमण और भावसे श्रमण-इसतरह यहां चार तरहका निक्षेप जानना ॥ भावसमणा हु समणा ण सेससमणाण सुग्गई जम्हा। जहिऊण दुविहमुवहिं भावेण सुसंजदो होह ॥१००२
भावश्रमणा हि श्रमणा न शेषश्रमणानां सुगतिर्यस्मात् । जहित्वा द्विविधमुपधिं भावेन सुसंयतो भव ॥ १००२ ॥ अर्थ-भावश्रमण हैं वे ही श्रमण हैं क्योंकि शेष नामादि श्रमणोंकी सुगति नहीं होती । इसलिये दोप्रकारके परिग्रहको त्यागकर उत्तम संयमी हो ॥ १००२ ॥ वदसीलगुणा जम्हा भिक्खाचरियाविसुद्धिए ठंति । तम्हा भिक्खाचरियं सोहिय साहू सदा विहारिज ॥
व्रतशीलानि गुणा यस्मात् भिक्षाचर्याया विशुद्ध्यां तिष्ठति । . तस्मात् भिक्षाचर्या शोधयित्वा साधुः सदा विहरेत् १००३