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________________ समयसाराधिकार १०। ३२५ गति होती है इसलिये लेश्यादिके कदाचित् न होनेपर भी धीर मुनि शुभध्यानका अवश्य चितवन करे। क्योंकि ध्यान सबमें मुख्य है ॥ ९०२ ॥ सम्मत्तादो णाणं णाणादो सव्वभावउवलद्धी। उवलद्धपदत्थो पुण सेयासेयं वियाणादि ॥९०३ ॥ सम्यक्त्वात् ज्ञानं ज्ञानात् सर्वभावोपलब्धिः। उपलब्धपदार्थः पुनः श्रेयः अश्रेयः विजानाति ॥९०३॥ अर्थ-सम्यक्त्वसे ज्ञान सम्यग्ज्ञान होता है ज्ञानसे सब पदार्थों के स्वरूपकी पहचान होती है और जिसने पदार्थोंका स्वरूप अच्छीतरह जान लिया है वही पुण्य पापको अथवा हित अहितको जानता है ॥ ९०३ ॥ सेयासेयविदण्हू उडुददुस्सील सीलवं होदि। सीलफलेणन्भुदयं तत्तो पुण लहदि णिव्वाणं ॥९०४॥ श्रेयोश्रेयोविद् उद्धृतदुःशीलः शीलवान् भवति । शीलफलेनाभ्युदयं ततः पुनः लभते निर्वाणं ॥ ९०४ ॥ अर्थ-पुण्यपापका ज्ञाता होनेसे कुशीलको दूरकर अठारह हजार शीलका धारण करनेवाला होता है उसके बाद शीलके फलसे वर्गादिका सुख भोग मोक्षको पाता है ॥ ९०४ ॥ सव्वंपि हु सुदणाणं सुट्ट सुगुणिदंपि सुट्ठ पढिदंवि । समणं भट्ठचरित्तं ण हु सको सुग्गइ णे, ॥९०५॥ सर्वमपि हि श्रुतज्ञानं सुष्टु सुगुणितमपि सुष्टु पठितमपि । श्रमणं भ्रष्टचारित्रं न हि शक्यं सुगतिं नेतुं ॥ ९०५॥ अर्थ-यद्यपि मुनिने सब ही श्रुतज्ञान अच्छीतरह पढलिया
SR No.022324
Book TitleMulachar
Original Sutra AuthorN/A
AuthorManoharlal Shastri
PublisherAnantkirti Digambar Jain Granthmala
Publication Year1919
Total Pages470
LanguageSanskrit
ClassificationBook_Devnagari
File Size25 MB
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