SearchBrowseAboutContactDonate
Page Preview
Page 267
Loading...
Download File
Download File
Page Text
________________ २३० मूलाचारसाधु कृतिकर्मको करता हुआ भी कृतिकर्मकी निर्जराका पात्र नहीं होसकता ॥ ६०८॥ हत्थंतरेणबाधे संफासपमजणं पउज्जंतो। जाऐंतो वंदणयं इच्छाकारं कुणइ भिक्खू ॥६०९॥ हस्तांतरे अनाबाधे संस्पर्शप्रमार्जनं प्रयुजानः । याचमानो वंदनां इच्छाकारं करोति भिक्षुः ॥६०९ ॥ अर्थ-एक हाथके अंतरसे बाधारहित आसन कटि आदिकी शुद्धि करता साधु वंदनाको याचता हुआ इच्छाकार अर्थात् प्रणाम करे ॥ ६०९॥ तेण च पडिच्छिदव्वं गारवरहिएण सुद्धभावेण । किदियम्मकारकस्सवि संवेगं संजणंतेण ॥ ६१०॥ तेन च प्रत्येशितव्यं गर्वरहितेन शुद्धभावेन । कृतिकर्मकारकस्यापि संवेगं संजनयता ॥ ६१०॥ अर्थ-ऋद्धि आदि के अभिमान रहित, वंदना करनेवालेको धर्ममें हर्ष उत्पन्न करता हुआ, शुद्ध भावों युक्त आचार्यको वंदना अंगीकार करनी चाहिये ॥ ६१० ॥ वंदणणिजुत्ती पुण एसा कहिया मए समासेण । पडिकमणणिजुत्ती पुण एतो उडूं.पवक्खामि ॥६११॥ वंदनानियुक्तिः पुनः एषा कथिता मया समासेन । प्रतिक्रमणनियुक्तिः पुन इत ऊर्ध्वं प्रवक्ष्यामि ॥ ६११ ॥ अर्थ-मैंने यह वंदनानियुक्ति संक्षेपसे कही है अब इससे आगे प्रतिक्रमण नियुक्तिको कहता हूं ।। ६११ ॥
SR No.022324
Book TitleMulachar
Original Sutra AuthorN/A
AuthorManoharlal Shastri
PublisherAnantkirti Digambar Jain Granthmala
Publication Year1919
Total Pages470
LanguageSanskrit
ClassificationBook_Devnagari
File Size25 MB
Copyright © Jain Education International. All rights reserved. | Privacy Policy