SearchBrowseAboutContactDonate
Page Preview
Page 254
Loading...
Download File
Download File
Page Text
________________ षडावश्यकाधिकार । २१७ अर्थ—ऐसे पूर्वोक्त विशेषणों सहित जिनेंद्रदेव मुझे जन्ममरणरूप रोगसे रहित करें तथा भेद ज्ञानकी प्राप्ति और समाधिमरण दें। क्या यह निदान है यहां विकल्पसे समझना ॥ ५६६ ॥ वास्तवमें यह निदान नहीं है इसका खुलासा करते हैं;भासा असचमोसा णवरि हु भत्तीय भासिदा भासा। ण हु खीणरागदोसा दिति समाहिं च बोहिं च॥५६७ भाषा असत्यमृषा केवलं हि भक्क्या भाषिता भाषा । न हि क्षीणरागद्वेषा ददति समाधिं च बोधिं च ॥५६७॥ अर्थ-यह असत्यमृषा वचन है केवल भक्तिसे यह वचन कहा गया है। क्योंकि जिनके राग द्वेष क्षीण होगये हैं वे जिनदेव समाधि और बोधिको नहीं देसकते ॥ ५६७ ॥ जं तेहिं दु दादव्वं तं दिण्णं जिणवरेहिं सव्वेहिं । दंसणणाणचरित्तस्स एस तिविहस्स उवदेसो॥५६८॥ यत् तैस्तु दातव्यं तद्दत्तं जिनवरैः सर्वैः। दर्शनज्ञानचारित्राणां एष त्रिविधानामुपदेशः ॥५६८ ॥ अर्थ-जो जिनवरोंकर देनेयोग्य था वह सब देदिया । वह देने योग्य वस्तु दर्शन ज्ञान चारित्र इन तीनोंका उपदेश है। यही मोक्षका कारण है ॥ ५६८ ॥ भत्तीए जिणवराणं खीयदि जं पुव्वसंचियं कम्मं । आयरियपसाएण य विज्जा मंता य सिज्झंति॥५६९॥ भक्त्या जिनवराणां क्षीयते यत् पूर्वसंचितं कर्म । आचार्यप्रसादेन च विद्या मंत्राश्च सिद्धयंति ॥ ५६९ ॥ अर्थ-जिनेंद्र देवोंकी भक्ति करनेसे पूर्व इकट्ठे किये हुए
SR No.022324
Book TitleMulachar
Original Sutra AuthorN/A
AuthorManoharlal Shastri
PublisherAnantkirti Digambar Jain Granthmala
Publication Year1919
Total Pages470
LanguageSanskrit
ClassificationBook_Devnagari
File Size25 MB
Copyright © Jain Education International. All rights reserved. | Privacy Policy