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________________ २०२ मूलाचारक्रमके अनुसार आचार्योंकी परिपाटीसे आगमकी परिपाटीके अनुसार संक्षेपसे कहता हूं ॥५१७ ॥ णामट्ठवणा दव्वे खेत्ते काले तहेव भावे य । सामाइयह्मि एसो णिक्खेओ छविओ ओ॥५१८॥ नामस्थापना द्रव्यं क्षेत्रं कालस्तथैव भावश्च । सामायिके एषः निक्षेपः षड्विधो ज्ञेयः॥ ५१८॥ अर्थ-नाम स्थापना द्रव्य क्षेत्र काल भाव-इसतरह सामायिकमें छह प्रकारका निक्षेप जानना । शुभ अशुभ नामोंमें रागद्वेषका त्याग वह नामसामायिक है । इसीतरह अन्य भी जानना ॥ सम्मत्तणाणसंजमतवेहिं जं तं पसत्थसमगमणं । समयंतु तं तु भणिदं तमेव सामाइयं जाणे ॥५१९॥ सम्यक्त्वज्ञानसंयमतपोभिः यत्तत् प्रशस्तसमागमनं । समयस्तु स तु भणितस्तमेव सामायिकं जानीहि ॥५१९॥ अर्थ-सम्यक्त्व ज्ञान संयम तप-इन करके जो जीवके भली प्राप्ति अथवा उनकर सहित जीवके एकता वह समय है उसीको तुम सामायिक जानो ॥ ५१९ ॥ जिदउवसग्गपरीसह उवजुत्तो भावणासु समिदीसु। जमणियमउजदमदी सामाइयपरिणदो जीवो॥५२०॥ जितोपसर्गपरीषह उपयुक्तः भावनासु समितिषु । यमनियमोद्यतमतिः सामायिकपरिणतो जीवः ॥५२०॥ अर्थ-जिसने उपसर्ग और परीषहोंको जीतलिया है जो बारह भावना तथा पांच समितियोंमें उपयोगयुक्त है और जो यम नियमोंमें उद्यमी है वह जीव सामायिकमें लगा हुआ जानना ५२०
SR No.022324
Book TitleMulachar
Original Sutra AuthorN/A
AuthorManoharlal Shastri
PublisherAnantkirti Digambar Jain Granthmala
Publication Year1919
Total Pages470
LanguageSanskrit
ClassificationBook_Devnagari
File Size25 MB
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