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________________ समाचाराधिकार ४ । यथायोग्यं कर्तव्यं स्वकशक्त्या प्रयत्नेन ॥ १७४ ॥ अर्थ-ऋषियोंके समुदायमें रोगादिकर पीड़ित शक्तिवाले, दीक्षागुरु आदि गुरु, नये दीक्षित, बुढापेसे जीर्ण वा दीक्षासे अधिक, शास्त्र पढने में उद्यमी वा स्वार्थपर निर्गुणी-इन सबकी यथायोग्य अपनी शक्तिको नहीं छिपाके यत्नाचारसे शरीरकी सेवा ( टहल ) करना चाहिये ॥ १७४ ॥ ___ आगे परगणमें वंदनादि क्रिया भी अकेला न करे मिलके करे ऐसा कहते हैंदिवसियरादियपक्खियचाउम्मासियवरिस्सकिरियासु रिसिदेववंदणादिसु सहजोगो होदि काव्यो॥१७॥ दैवसिकीरात्रिकीपाक्षिकीचातुर्मासिकीवार्षिकीक्रियासु । ऋषिदेववंदनादिपु सहयोगो भवति कर्तव्यः ॥ १७५ ॥ अर्थ-दिनमें होनेवाली, रात्रिकी, पक्ष संबंधी, चौमासेकी, वर्षसंबंधी क्रियाओंको तथा साधुवंदना देववंदना आदि क्रियाओंको साथ ( मिलकर ) ही करना चाहिये ॥ १७५ ॥ __ कोई दोषलगे तो उसका प्रायश्चित्त भी वहां ही करे;मणवयणकायजोगेणुप्पण्णवराध जस्स गच्छम्मि। मिच्छाकारं किच्चा णियत्तणं होदि कायव्वं ॥ १७६ ॥ मनोवचनकाययोगैः उत्पन्नापराधः यस्य गच्छे । मिथ्याकारं कृत्वा निवर्तनं भवति कर्तव्यम् ॥ १७६ ॥ अर्थ-मनवचनकायकी क्रियाओंकर जिसके गच्छमें अतीचाररूप दोष लगे उसे उसीके गच्छमें मिथ्याकाररूप पश्चात्ताप करके दूर करदेना चाहिये ॥ १७६ ॥
SR No.022324
Book TitleMulachar
Original Sutra AuthorN/A
AuthorManoharlal Shastri
PublisherAnantkirti Digambar Jain Granthmala
Publication Year1919
Total Pages470
LanguageSanskrit
ClassificationBook_Devnagari
File Size25 MB
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