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________________ समाचाराधिकार ४ । င်ဖ गुरुको कैसे पूछे यह कहते हैं; - तुझं पादपसाएण अण्णमिच्छामि गंतुमायदणं । तिण्णि व पंच व छावा पुच्छाओ एत्थ सो कुणइ १४६ युष्माकं पादप्रसादेन अन्यदिच्छामि गंतुमायतनम् । तिस्रः वा पंच वा षट् वा पृच्छाः अत्र स करोति ॥ १४६ ॥ अर्थ- हे गुरो मैं तुम्हारे चरणोंके प्रसादसे सब शास्त्रोंके पारगामी अन्य आचार्य के प्रति जाना चाहता हूं । इस अवसर पर तीन वा पंच वा छह वार तक पूछना चाहिये ऐसा करने से उत्साह और विनय मालूम होता है ॥ १४६ ॥ एवं आपूच्छित्ता सगवरगुरुणा विसज्जिओ संतो । अप्पचउत्थो तदिओ बिदिओ वा सो तदो णीदी १४७ एवं आपृच्छ्य स्वकवरगुरुणा विसर्जितः सन् । आत्मचतुर्थः तृतीयद्वितीयो वा स ततो निरेति ॥ १४७॥ अर्थ – इसप्रकार अपने श्रेष्ठगुरुओं को पूछकर उनसे आज्ञा लेता हुआ आप तीनमुनियोंको साथ लेकर अथवा दो वा एकको साथ लेकर वहांसे निकले अन्य जगहको जावे । अकेला जाना योग्य नहीं है ॥ १४७ ॥ -- अकेला न जानेका कारण बतलाते हैं;गिदित्य विहारो विदिओऽ गिहिदत्थसंसिदो चेव । एतो तदियविहारो णाणुण्णादो जिणवरेहिं ॥ १४८ ॥ stars: विहारो द्वितीयोऽगृहीतार्थसंश्रितश्चैव । एताभ्यां तृतीयविहारो नानुज्ञातो जिनवरैः ॥ १४८ ॥ अर्थ - जिसने जीवादि तत्त्व अच्छी तरह जान लिये हैं ऐसा
SR No.022324
Book TitleMulachar
Original Sutra AuthorN/A
AuthorManoharlal Shastri
PublisherAnantkirti Digambar Jain Granthmala
Publication Year1919
Total Pages470
LanguageSanskrit
ClassificationBook_Devnagari
File Size25 MB
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