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________________ १५० आत्मानुशासन. चाहिये । जो ऐसा करता है वही सदाचारी व ज्ञानी समझना चाहिये और उसीको अटूट सुख व कीर्ति प्राप्त होसकती है। सच्चा बुद्धिमान् कौन ? साधारणौ सकलजन्तुषु वृद्धिनाशी, जन्मान्तरार्जितशुभाशुभकर्मयोगात् । धीमान् स यः सुगतिसाधनद्धिनाश, स्तद्वयत्ययाद्विगतधीरपरोभ्यधायि ॥ १४८ ॥ अर्थ:--जो अपना हित सिद्ध कर सकता है व करलेता है एवं अहितको दूर कर सकता है वह बुद्धिमान् समझा जाता है । जो ऐसा नहीं कर सकता है उसे लोग मूर्ख समझते हैं । यह बात ठीक है, परंतु हित व अहित है क्या ? जनसाधारणमें धन दौलत, विषय भोगादिकी सामग्री, स्त्री-पुत्रादिकी पूर्णता व अनुकूलता, ये सब हित समझे जाते हैं। दरिद्रता, विषयभोगोंकी कमी, इत्यादिको लोग अहित कहते हैं । धन दौलत वगैरह हितको जिसने अच्छी तरह साधलिया हो वह बुद्धिमान् समझा जाता है और जो ऐसा नहीं कर सकता वह मूर्ख माना जाता है । पर यथार्थमें देखनेसे मालूम होगा कि धन दौलतसे सच्चा हित नहीं हो सकता और दरिद्रता बनी रहनेसे कुछ अहित नहीं हो सकता है । धन दौलत वगैरह जो कि हितावह माने जाते हैं वे सब कर्मकी माया हैं। शुभाशुभ जैसे कर्मका जिस समय उदय होता है उस समय वैसे अच्छे बुरे संबंध आकर मिलते हैं । मनुष्य कितना ही बुद्धिमान् क्यों न हो परंतु कर्म अशुभका उदय रहते हुए धन दौलत कभी नहीं कमा स. कता है । यदि कर्म शुभका उदय हो तो मूर्ख मनुष्यके पास भी धन दौलत इकट्ठी हो जाती है । तब ? इसमें प्रयत्न करना केवल कहनेमात्र है । धन दौलत वगैरह सारी ऐहिक विभूतिका समर्थ कारण देखना हो तो एक मात्र शुभाशुभ कर्मोदय है । इसलिये किसीको धनी व गरीब देखकर बुद्धिमान् व मूर्ख मानना सर्वथा भूल है । धन दौलत
SR No.022323
Book TitleAatmanushasan
Original Sutra AuthorN/A
AuthorBansidhar Shastri
PublisherJain Granth Ratnakar Karyalay
Publication Year1916
Total Pages278
LanguageSanskrit
ClassificationBook_Devnagari
File Size21 MB
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