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________________ ४३० श्री संवेगरंगशाला में दुष्करकारक कौन है ? उसे फरमाईये । प्रभु ने कहा कि-निश्चय ये सभी साधु दुष्करकारक हैं, फिर भी इसमें दुष्करकारी ढंढ़ण कुमार मुनि है। क्योंकि धीर हृदय वाला, दुःसह उग्र अलाभ परीषह को सम्यग् रूप सहन करते उसका बहत काल हो गया है। यह सुनकर वह धन्य है, और कृत पूण्य है कि जिसकी इस तरह जगत के एक प्रभु ने स्वयं स्तुति की है।' ऐसा विचार करते कृष्ण जैसे आया था वैसे वापिस गया और नगरी में प्रवेश करते उसने भाग्य योग से उच्च नीच घरों में भिक्षार्थ घूमते-घूमते उस महात्मा को देखा। इससे दूर से ही हाथी ऊपर से उतर कर परम भक्ति पूर्वक पृथ्वी तल को स्पर्श करते मस्तक द्वारा श्रीकृष्ण ने उनको नमस्कार किया। कृष्ण वासुदेव द्वारा वंदन करते उस मुनि को देखकर विस्मित मन वाले घर में रहे एक धनाढ्य सेठ ने विचार किया कि-यह महात्मा धन्य है कि जिसको इस तरह देवों के भी वंदनीय वासूदेव सविशेषतया भक्ति पूर्वक वंदन करता है। फिर कृष्ण महाराज वंदन कर जब वापिस चले तब क्रमशः भिक्षार्थ घूमते ढंढ़ण कुमार उस धनाढ्य सेठ के घर पहुंचे। इससे उसने परम भक्ति पूर्वक सिंह केसरी लड्डु के थाल में से उनको दिये और वह मुनि प्रभु के पास गया, नमस्कार करके उस मुनि ने कहा कि-हे भगवन्त ! क्या मेरा अन्तराय कर्म आज खतम हो गया है ? प्रभु ने कहा कि अभी भी उसका अंश विद्यमान है। परमार्थ से यह लब्धि कृष्ण की है, क्योंकि उसने तुमको नमस्कार करते देखकर धनाढ्य ने यह लड्ड तुझे दिये हैं। प्रभु ने जब ऐसा कहा तब अन्य की लब्धि होने से वह महात्मा शुद्ध भूमि को देखकर उन लड्ड को सम्यग विधि पूर्वक परठने लगे। उसे परठते और कर्मों का कटु विपाकों का चिंतन करते उन्हें शुद्ध शुक्ल ध्यान के प्रभाव से केवल ज्ञान उत्पन्न हुआ। फिर केवली पर्याय को पाल कर और भव्य जीवों को प्रतिबोध देकर, जिसके लिए दीक्षा ली थी वह मोक्षपद प्राप्त किया। इस तरह लाभालाभ कर्माधीन जानकरहे धीर ! लाभ की प्राप्ति वाले भी तुझे अत्यन्त प्राप्ति होने पर उसका मद नहीं करना चाहिए। इस तरह सातवाँ लाभमद का स्थान कहा है। अब ऐश्वर्य मद को रोकने में समर्थ आठवाँ मद स्थान को संक्षेप से कहता हूँ। ८. ऐश्वर्यमद द्वार :-गणिम, धरिम, मेय और पारिचेद्य इस तरह चार प्रकार का धन मुझे बहुत है, और भंडार क्षेत्र तथा वस्तु मकान मुझे अनेक प्रकार का है। चाँदी, सोने के ढेर हैं, आज्ञा के पालन करने वाले अनेक नौकर हैं, दास दासीजन भी हैं, तथा रथ, घोड़े और श्रेष्ठ हाथी भी हैं। विविध प्रकार की गाय हैं, भैंस, ऊँट आदि हैं, बहुत मंडार हैं, गाँव, नगर और
SR No.022301
Book TitleSamveg Rangshala
Original Sutra AuthorN/A
AuthorPadmvijay
PublisherNIrgranth Sahitya Prakashan Sangh
Publication Year1986
Total Pages648
LanguageSanskrit, Hindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size18 MB
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