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________________ श्री संवेगरंगशाला २२६ सारा पूर्वजन्म का वृत्तान्त जाना। फिर परम निर्वेद को प्राप्त करते उसने विचार किया कि-हा! हा! अनर्थ का स्थान रूप इस संसारवास को धिक्कार हो, क्योंकि वैसा निर्मल विवेक वाला, धर्म रागी भी और प्रति समय शास्त्रोक्त विधि अनुसार अनुष्ठान को करने वाला भी मैंने उस बाल अर्थात् अज्ञान मरण से ऐसी विषम दशा को प्राप्त की है। अब तिर्यंच जीवन में रहा हूँ, मैं क्या कर सकता हूँ ? अथवा ऐसा विचार करने से क्या लाभ ? इस अवस्था के उचित भी धर्म कार्य करूं, ऐसे जीवन से क्या है ? ऐसा विचार करते उसे थका हआ मानकर उन खिलाड़ियों ने, अपने स्थान पर ले गये और उसने वहाँ अनशन स्वीकार किया। उसके बाद श्री पंचपरमेष्ठि मन्त्र का बार-बार स्मरण करते शुद्ध भाव से मरकर उस देवलोक में महाद्धिक देव बना। वहाँ अवधि ज्ञान से पूर्व का वृत्तान्त जानकर, यहाँ आकर राजा को प्रतिबोध किया और सुन्दरी को भी प्रतिबोध होने से प्रवज्या स्वीकार करने के लिये आचार्य महाराज को सौंपा। इस तरह तिर्यंचपने को प्राप्त कर भी जीव को कहा था उसके अनुसार पण्डित मरण निष्पाप सद्गति रूप नगर के महान राज्य को देता है। पण्डित मरण की महिमा :-समग्र जीवन तक भी दुान आदि करके पाप समूह का भोग करने वाला जीव अन्तिम में पण्डित मरण को प्राप्त कर शुद्ध होता है। अनादि काल से संसारिक रूपी अटवी में फँसा हुआ जीव तब तक पार को नहीं प्राप्त करता कि जब तक यहाँ पूर्व में ऐसा कभी भी नहीं मिला हुआ पण्डित मरण प्राप्त नहीं करता । पण्डित मरण से मरे हुये कई जीव तो उसी ही भव में, कई देवलोक में जाकर पुनः मनुष्य जन्म आकर, श्रावक कुल जन्म लेकर, और दीर्घकाल साधु जीवन पालन कर, पण्डित मरण से मरकर, तीसरे जन्स में भी सिद्ध होते हैं । पण्डित मरण से मरने वाला जीव नरक और तिर्यंच बिना उत्तम मनष्य और देवलोक में विलास करके भी आखिर आठवें भव में सिद्ध हो जायेगा । उसमें गृहस्थ अथवा साधु निर्जीव प्रदेश में रहे, विधिपूर्वक अतिचार रूपी सभी शल्यों का त्याग करके, सर्व आहार का त्याग करके, छहकाय जीवों की रक्षा तत्पर बने । अन्य को क्षमा याचना करने में और स्वयं क्षमा देने में भी तत्पर, विराधना का त्यागी, चपलता रहित, जितेन्द्रिय, तीन दण्ड रूप शत्रुओं का विजेता, चार कषाय की सेना को जीतने वाला और शत्रु मित्र समताभाव रखने वाला, इस तरह पण्डित मरण से जो मरता है, वह निश्चय सम्यग् जानना । यह पण्डित मरण लघुकर्मी समकित दृष्टि जीव को होता है, मिथ्यात्वी को नहीं होता है। क्या इस संसार में अल्प पुण्य वाले को चिन्तामणी रत्न को प्राप्त कर सकता है ? इसलिये उसके
SR No.022301
Book TitleSamveg Rangshala
Original Sutra AuthorN/A
AuthorPadmvijay
PublisherNIrgranth Sahitya Prakashan Sangh
Publication Year1986
Total Pages648
LanguageSanskrit, Hindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size18 MB
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