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________________ (१८५) रस्त्रीका तौ मनवचनकाय कृतकारित अनुमोदनाकरि त्याग करै अर स्वस्त्रीकै विष संतोष करै. तीवकामके विनोद क्रीडारूप न प्रवः. जात स्त्रीके शरीरकू अपवित्र दुर्गन्ध जाणि वैराग्य भावनारूप भाव राख. अर कापकी तीव्र वेदना इस स्त्रीके निमिच होय है ताके रूप लावण्य आदि चेष्टाकूम. नके मोहनेकौं ज्ञानके भुलाउनेकौं कामके उपजाबनेकौं कारण जाणि विरक्त रहै सो चतुर्थ अणुव्रतका धारी होय है. बहुरि याके अतीचार परविवाह करणा, परकी परणी वि. नापरणी स्त्रीका संसा, कामकी क्रीडा, कामका तीव्र अभिमाय, ए कह्या है. ते स्त्रीका देहत विरक्त रहना इस विशेषणमें आय गये. परस्त्रीका त्याग तौ पहली प्रतिमा सात व्यसनके त्यागमें आय गया, इहां अति तीव्र कामकी वासनाका भी त्याग है. तातें अतीचार रहित व्रत पलै है. अपनी स्त्रीकेविष भी तीव्रपणा नाहीं होय है. ऐसे ब्रह्मैचर्य व्रतका कथन कीया ॥ ३३७-३३८ ॥ अब परिग्रहपरिमाण पांचमा अणुव्रतका कथन कर हैंजो लोहं णिहणिता संतोसरसायणेण संतुट्ठो। णिहणदि तिला दुट्ठा मण्णंतो विणस्सरं सव्वं ३३९॥ जो परिमाणं कुव्वदि धणधाणसुवण्णखित्तमाईणं । उवओगं जाणिचा अणुव्वयं पंचमं तस्स ॥३४॥ भाषार्थ-जो पुरुष लोभ कषायकौं हीनकरि संतोषरूप है
SR No.022298
Book TitleSwami Kartikeyanupreksha
Original Sutra AuthorN/A
AuthorJaychandra Pandit
PublisherBharatiya Jain Siddhant Prakashini Samstha
Publication Year
Total Pages306
LanguageSanskrit, Hindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size18 MB
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