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________________ ( ९७ ) जदि जीवादो भिण्णं सवपयारेण हवदितं णाणं । गुणगुणिभावो य तदा दूरेण प्पणस्सदे दुहूं ॥१७९॥ . भाषार्थ- जो जीवः ज्ञान सर्वथा भिन्न ही मानिये तौ तिन दोऊनिकै गुणगुणिभाव दूरतें ही नष्ट होय. भावार्थ-यह जीव द्रव्य है यह याका ज्ञान गुण है. ऐसा भाव न ठहरै। ___आगें कोई पूछै जो गुण अर गुणीका भेद विनादोय नाम कैसे कहिये नाका समाधान कर हैं- .. जीवस्स विणाणस्स वि गुणगुणिभावेण कीरए भेओ। जं जाणदि तं गाणं एवं भेओ कहं होदि ॥ १८०॥ ___ भाषार्थ-जीवकै अर बानकै गुणगुणीमावकरि भेद कथंचित कीजिये है. बहुरि जो जाणे सो ही आत्माका ज्ञान है ऐसे भेद कैसे होय. भावार्थ-सर्वथा भेद होय तौ. जाणे सो ज्ञान है ऐसा अभेद कैसैं कहिये तातें कथंचित गुणगुणीभाव करि भेद कहिये है, प्रदेशभेद नाहीं । ऐसे केई अन्यमती गुणगुणीमें सर्वथा भेद मानि जीवकै अर ज्ञानकै सर्वथा अर्थान्तरभेद मानें हैं तिनिका मत निषेध्या ॥ भागें चार्वाकमती ज्ञान• पृथ्वी आदिका विकार मानै है ताकू निषेधै हैं- . गाणं भूयवियारं जो मण्णदि सो वि भूदगहिदव्वो।
SR No.022298
Book TitleSwami Kartikeyanupreksha
Original Sutra AuthorN/A
AuthorJaychandra Pandit
PublisherBharatiya Jain Siddhant Prakashini Samstha
Publication Year
Total Pages306
LanguageSanskrit, Hindi
ClassificationBook_Devnagari
File Size18 MB
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