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________________ सुधास्थानेषु नैव स्यात्कालदंशोऽपि मृत्यवे । विषस्थानेषु दंशस्तु प्रशस्तोऽप्याशु मृत्यवे ॥ 238 ॥ अमृत की कला जहाँ विद्यमान हो, वहाँ यदि सर्प का दंश हो तो व्यक्ति की मृत्यु नहीं होती किन्तु विषस्थल पर दंश अच्छा हो तो भी उससे शीघ्र मृत्यु की आशङ्का जाननी चाहिए । अथ जन्मचर्या नाम अष्टमोल्लासः : 215 सुधाकलास्थितान् प्राणान् ध्यायन्नात्मनि चात्मना । निर्विषत्वं वयस्तम्भं कान्तिं प्राप्नोति दष्टकः ॥ 239 ॥ दंशित व्यक्ति अमृत की कला में विद्यमान प्राण का अपनी-अपनी आत्मा में चिन्तन करे तो उससे विष का नाश होता है। इससे तरुणावस्था स्थायी रहे और शरीर पर प्रभविष्णुता आती है । अथ विषनाशोपाय कथ्यते - - जिह्वायास्तालुना योगा दमतस्रवणं च यत् । विलिप्तस्तेन दंशः स्यान्निर्विषः क्षणमात्रतः ॥ 240 ॥ * जीभ को तालू पर लगाने से जो अमृत झरता है, उसका लेप यदि दंशस्थल पर किया जाए तो क्षणभर में विष का विनाश होता है। अन्यदप्याह तक सिर से नीचे के अङ्गुष्ठ तक दक्षिणाङ्ग में कामदेव की स्थिति उतरती हुई होती है— स्त्रीणां सर्वेषु चाङ्गेषु कामः चन्द्रकलामयः । स्थानेषु येषु सन्तिष्ठेत् तत् इदानीं निगद्यते ॥ अङ्गुष्ठे चरणे गुल्फै जानौ (नाभौ ?) जघन पुष्पके। नाभौ वक्षसि वक्षौजैः कक्षायां कण्ठ कन्दले ॥ अधरे च कपोले च नेत्रे भाले च मस्तके। प्रतिपत् पौर्णिमा यावत् कामो तत्र वसते पुनः ॥ वामाङ्गे वामनेत्रणां आरोहति यथाक्रमम्। मन्मथः कृष्णपक्षे तु दक्षिणाङ्गे समुत्तरेत् ॥ ( कामराजरतिसार 2, 53-56) 1. खेचरी मुद्रा के अभ्यासी के लिए यह सम्भव है । कपाल कुहर में जिह्वा को लटकाकर लगाने से योगी को इस तरह से अमृत की प्राप्ति होती है, जैसा कि हठयोगप्रदीपिका में आया हैकपालकुहरे जिह्वा प्रविष्टा विपरीतगा । श्रुवोरन्तर्गता दृष्टिर्मुद्रा भवति खेचरी ॥ छेदनचालनदोहैः कलां क्रमेण वर्धयेत्तावत् । सा यावद् भ्रूमध्यं स्पृशति तदा खेचरीसिद्धिः ॥ स्नुहीपत्रनिभं शस्त्रं सुतीक्ष्णं स्निग्धनिर्मलम् । समादाय ततस्तेन रोममात्रं समुच्छिनेत् ॥ ततः सैन्धवपथ्याभ्यां चूर्णिताभ्यां प्रघर्षयेत् । पुनः सप्तदिने प्राप्ते रोममात्रं समुच्छिनेत् ॥ एवं क्रमेण षण्मासं नित्यं युक्तं समाचरेत् । षण्मासाद्रसनामूलशिलाबन्धः प्रणश्यति ॥ कलां पराङ्गमुखीं कृत्वा त्रिपथे परियोजयेत् । सा भवेत्खेचरी मुद्रा व्योमचक्रं तदुच्यते ॥ ( हठयोग. 3, 32-37 एवं घेरण्ड 3, 23-25 तथा शिवपुराणादि) योगगीता में आया है कि खेचरी मुद्रा के अभ्यास करने से भी नाद श्रवणाभ्यास की भाँति ही पहले तो योगी के सभी अङ्गों में स्फुटन होने लगता है और बाद में सिर काँपने लगता है। कभी-कभी सारी देह भी काँपती प्रतीत होती है। इसके बाद जिह्वा के अग्रभाग में अमृत का-सा स्वाद आने लगता है- • खेचर्यभ्यासतोऽप्यादौ गात्राणां भञ्जनं भवेत् । शिरसः कम्पनं पश्चात्सर्वदेहस्य कम्पनम् ॥ अमृतास्वादनं पश्चाज्जिह्वाग्रे सम्प्रवर्त्तते । योगनिद्रा भवेत्पश्चादभ्यासेन शनैः शनैः ॥ ( योगगीता 15, 83-84)
SR No.022242
Book TitleVivek Vilas
Original Sutra AuthorN/A
AuthorShreekrushna
PublisherAaryavart Sanskruti Samsthan
Publication Year2014
Total Pages292
LanguageSanskrit, Hindi
ClassificationBook_Devnagari & Book_Gujarati
File Size22 MB
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